Nishad Society

About All Subcaste

निषाद जाति भारतवर्ष की मूल एवं प्राचीनतम जातियों में से एक हैं। रामायणकाल में निषादों की अपनी अलग सत्ता एवं संस्कृति थी, एवं निषाद एक जाति नहीं बल्कि चारों वर्ण से अलग "पंचम वर्ण" के नाम से जाना जाता था। आदिकवि महर्षि बाल्मीकि, विश्वगुरू महर्षि वेद व्यास, भक्त प्रह्लाद और रामसखा महाराज श्रीगुहराज निषाद जैसे महान आत्माओं ने इस जाति सुशोभित किया है। स्वतंत्रता आन्दोलन में भी इस समुदाय के शूरवीरों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, लेकिन आज इस समुदाय के लोंगो में वैचारिक भिन्नता के कारण समुदाय का विकास अवरुद्ध सा हो गया है। उप-जाति, कुरी, गौत्र के आधार पर समुदाय का विखंडन हो रहा है, फलतः समुदाय के सामाजिक, धार्मिक आर्थिक एवं राजनैतिक मान-मर्यादा में ह्रास हो रहा है। इसी वैचारिक भिन्नता का उन्मूलन एवं उप-जाति, कुरी, गौत्र के आधार सामाजिक विखराव को रोकने हेतु एक प्रयास किया जा रहा है। इसके माध्यम से हम अपने समुदाय के सभी सदस्यों को भाषा, क्षेत्र, उप-जाति, कुरी, गौत्र जैसे भेदभाव मिटाकर आपसी एकता को मजबूत करने का अनुरोध करते हैं।

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Nishad in Indian Epic

Nishada (niśāda) भारतीय महाकाव्य महाभारत में वर्णित एक राज्य का नाम है। राज्य में एक ही नाम की एक जनजाति के थे।

Mahabarata में, Nishadas पहाड़ियों और उनके निवास के लिए जंगलों है कि जनजातियों के रूप में उल्लेख कर रहे हैं। वे रग नामक एक राजा के साथ जुड़े हुए हैं क्रोध और द्वेष का गुलाम बन गया है, और हक से महरूम हो गया, जो (Saraswata किंगडम देखें)। ब्राह्मण ने उसे मार डाला। रग के वंशजों में से कुछ Nishadas बन गया है और कुछ अन्य लोगों के विंध्य पर्वतों (12,58) पर रहने वाले Mlechchhas, कहा जाता था।

एकलव्य एक Nishada जनजाति के एक राजा था। उन्होंने एक बार द्वारका हमला किया, और लड़ाई में वासुदेव कृष्ण ने मार डाला था। यह राज्य भारत के राजस्थान राज्य के भीलवाड़ा में नाम संभवतः जिले में अरावली पर्वतमाला में स्थित था। एकलव्य के राज्य के अलावा कई अन्य Nishada राज्यों के थे।

नल-दमयंती की एक 18 वीं सदी पहाड़ी चित्रकला
Nishadha प्यार करता था और दमयंती विदर्भ राज्य की राजकुमारी से शादी की, जो मशहूर राजा नाला, का राज्य था। राज्य के राज्यक्षेत्र मध्य प्रदेश की वर्तमान दिन ग्वालियर जिले के आसपास के क्षेत्र के साथ पहचान की है। Nishadha Dasarna और कोशल के रूप में अच्छी तरह से विदर्भ के साथ के रूप में व्यापार मार्गों के माध्यम से जुड़ा था।
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History of Nishad

- जन्म - महाभारत काल
- मृत्यु - यदुवंशी श्रीकृष्ण द्वारा छल से
- पिता - महाराज हिरण्यधनु
- माता - रानी सुलेखा
- बचपन का नाम - अभिद्युम्न ( अभय )

जीवन से शिक्षा -
1. अपने लक्ष्य के प्रति लगन होना
2. समस्याओँ से डट कर सामना करना
3. माता पिता और गुरू का आदर करना
4. मन लगाकर परिश्रम करना आदि आदि

एकलव्य

एकलव्य निषाद वंश के राजा थे l निषाद वंश या जाति के संबंध मेँ सर्वप्रथम उल्लेख "तैत्तरीय संहिता" मेँ मिलता है जिसमेँ अनार्योँ के अंतर्गत निषाद आता है l "एतरेय ब्राह्मण" ग्रन्थ उन्हेँ क्रूर कर्मा कहता है और सामाजिक दृष्टि से निषाद को शूद्र मानता है l महाभारत काल मेँ प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश मेँ सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य एकलव्य के पिता निषादराज हिरण्यधनु का था l गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी l उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चन्देरी आदि बड़े राज्योँ के समकक्ष थी l निषाद हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता विख्यात थी l निषादराज हिरण्यधनु और रानी सुलेखा के स्नेहांचल से जनता सुखी व सम्पन्न थी l राजा राज्य का संचालन आमात्य (मंत्रि) परिषद की सहायता से करता था l निषादराज हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम "अभिद्युम्न" रखा गया l प्राय: लोग उसे "अभय" नाम से बुलाते थे l पाँच वर्ष की आयु मेँ एकलव्य की शिक्षा की व्यवस्था कुलीय गुरूकुल मेँ की गई l बालपन से ही अस्त्र शस्त्र विद्या मेँ बालक की लगन और एकनिष्ठता को देखते हुए गुरू ने बालक का नाम "एकलव्य" संबोधित किया l एकलव्य के युवा होने पर उसका विवाह हिरण्यधनु ने अपने एक निषाद मित्र की कन्या सुणीता से करा दियाl एकलव्य धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था l उस समय धनुर्विद्या मेँ गुरू द्रोण की ख्याति थी l पर वे केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वर्ग को ही शिक्षा देते थे और शूद्रोँ को शिक्षा देने के कट्टर विरोधी थे l महाराज हिरण्यधनु ने एकलव्य को काफी समझाया कि द्रोण तुम्हे शिक्षा नहीँ देँगेl

पर एकलव्य ने पिता को मनाया कि उनकी शस्त्र विद्या से प्रभावित होकर आचार्य द्रोण स्वयं उसे अपना शिष्य बना लेँगेl पर एकलव्य का सोचना सही न था - द्रोण ने दुत्तकार कर उसे आश्रम से भगा दियाl एकलव्य हार मानने वालोँ मेँ से न था और बिना शस्त्र शिक्षा प्राप्त तिए वह घर वापस लौटना नहीँ चाहता थाl एकलव्य ने वन मेँ आचार्य द्रोण की एक प्रतिमा बनायी और धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगाl शीघ्र ही उसने धनुर्विद्या मेँ निपुणता प्राप्त कर ली l एक बार द्रोणाचार्य अपने शिष्योँ और एक कुत्ते के साथ उसी वन मेँ आएl उस समय एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थेl कुत्ता एकलव्य को देख भौकने लगाl एकलव्य ने कुत्ते के मुख को अपने बाणोँ से बंद कर दियाl कुत्ता द्रोण के पास भागाl द्रोण और शिष्य ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या देख आश्चर्य मेँ पड़ गएl वे उस महान धुनर्धर की खोज मेँ लग गए अचानक उन्हे एकलव्य दिखाई दिया जिस धनुर्विद्या को वे केवल क्षत्रिय और ब्राह्मणोँ तक सीमित रखना चाहते थे उसे शूद्रोँ के हाथोँ मेँ जाता देख उन्हेँ चिँता होने लगीl तभी उन्हे अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के वचन की याद आयीl द्रोण ने एकलव्य से पूछा- तुमने यह धनुर्विद्या किससे सीखी?

एकलव्य- आपसे आचार्य एकलव्य ने द्रोण की मिट्टी की बनी प्रतिमा की ओर इशारा कियाl द्रोण ने एकलव्य से गुरू दक्षिणा मेँ एकलव्य के दाएँ हाथ का अगूंठा मांगाl एकलव्य ने अपना अगूंठा काट कर गुरु द्रोण को अर्पित कर दिया l कुमार एकलव्य अंगुष्ठ बलिदान के बाद पिता हिरण्यधनु के पास चला आता है l एकलव्य अपने साधनापूर्ण कौशल से बिना अंगूठे के धनुर्विद्या मेँ पुन: दक्षता प्राप्त कर लेता हैl आज के युग मेँ आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओँ मेँ अंगूठे का प्रयोग नहीँ होता है, अत: एकलव्य को आधुनिक तीरंदाजी का जनक कहना उचित होगाl पिता की मृत्यु के बाद वह श्रृंगबेर राज्य का शासक बनता हैl अमात्य परिषद की मंत्रणा से वह न केवल अपने राज्य का संचालन करता है, बल्कि निषाद भीलोँ की एक सशक्त सेना और नौसेना गठित करता है और अपने राज्य की सीमाओँ का विस्तार करता हैl इस बीच मथुरा नरेश कंस के वध के बाद, कंस के संबंधी मगध नरेश जरासन्ध शिशुपाल आदि के संयुक्त हमलोँ से भयभीत श्रीकृष्ण मथुरा से अपने भाई बलराम व बंधु बांधवोँ सहित पश्चिम की ओर भाग रहे थेl तब निषादराज एकलव्य ने श्रीकृष्ण की याचना पर तरस खाकर उन्हेँ सहारा व शरण दियाl ( अधिक जानकारी के लिए पेरियार ललई सिँह यादव द्वारा लिखित एकलव्य नामक पुस्तक पढ़ेँ ) एकलव्य की मदद से यादव सागर तट पर सुरक्षित भूभाग द्वारिका मेँ बस गएl यदुकुल ने धीरे धीरे अपनी शक्तियोँ का विस्तार किया और यादवोँ ने सुरापायी बलराम के नेतृत्व मेँ निषादराज की सीमाओँ पर कब्जा करना प्रारम्भ कर दियाl इसी बीच श्रीकृष्ण ने अपनी नारायणी सेना (प्रच्छन्न युद्ध की गुरिल्ला सेना) भी गठित कर ली थीl

अब यादवी सेना और निषादोँ के बीच युद्ध होना निश्चित थाl यादवी सेना के निरंतर हो रहे हमलोँ को दबाने के लिए एकलव्य ने सेनापति गिरिबीर के नेतृत्व मेँ कई बार सेनाएँ भेजीँl पर यादवी सेनाओँ का दबाव बढ़ता जाता हैl
तब एकलव्य स्वयं सेना सहित यादवी सेना से युद्ध करने के लिए प्रस्थान करते हैँl बलराम और एकलव्य की सेना मेँ भयंकर युद्ध होता है और बलराम की पराजय होती हैl बलराम और यादवी सेना को पराजित कर एकलव्य विजय दुंदुभी बजाते हैँ, तभी पीछे से अचानक कृष्ण की नारायणी सेना जो कहीँ बाहर से युद्ध कर लौटी थी, एकलव्य पर टूट पड़ती है l एकलव्य इस अप्रत्याशित हमले से घिरकर रक्तरंजित हो जाते हैँ l ऐसी ही विकट स्थिति मेँ कृष्ण के हाथोँ महाबली एकलव्य का वध होता है l अपने महानायक एकलव्य की कृष्ण के हाथोँ मृत्यु से निषाद क्षुब्ध होते हैँ l यदुकुल पतन के बाद उन्हीँ मेँ से एक निषादवीर के द्वारा कृष्ण की हत्या कर दी गई l इतना ही नहीँ यादवी विनाश के बाद जब श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार शेष बचे यदुवंशीय परिवारोँ को लेकर अर्जुन द्वारिका से हस्तिनापुर जा रहे थे तब बदले की भावना से निषाद-भीलोँ की सेना ने वन पथ मेँ घेरकर भीषण मारकाट मचाई और अर्जुन को पराजित कर पुरूषोँ को बन्दी बना लिया l साथ ही यदुवंश की सुन्दरियोँ-गोपियोँ का अपहरण कर लिया l

" भीलन लूटी गोपिका,
ओई अर्जुन ओई बाण ll "
Posted by Jitendra Sahani

बिलासा देवी

निषाद संस्कृति की ध्वजवाहिका थी- बिलासा देवी
इस वीरांगना के नाम पर आज भी गुलजार है बिलासपुर छत्तीसगढ़ में बिलासा एक देवी के रुप में देखी जाती हैं. कहते हैं कि उनके ही नाम पर बिलासपुर शहर का नामकरण हुआ। बिलासा केवटिन की एक आदमक़द प्रतिमा भी शहर में लगी हुई है। बिलासा देवी के लिए छत्तीसगढ़ के लोगों में, ख़ासकर केवट समाज में, बड़ी श्रध्दा है और इसका एक सबूत यह भी है कि छत्तीसगढ़ की सरकार हर वर्ष मत्स्य पालन के लिए बिलासा देवी पुरस्कार भी देती है।
भारतीय सभ्यता का प्रजातिगत इतिहास निषाद, आस्ट्रिक या कोल-मुण्डा से आरंभ माना जाता है। यही कोई चार-पांच सौ साल पहले, अरपा नदी के किनारे, जवाली नाले के संगम पर पुनरावृत्ति घटित हुई। जब यहां निषादों के प्रतिनिधि उत्तराधिकारियों केंवट-मांझी समुदाय का डेरा बना। आग्नेय कुल का नदी किनारे डेरा। अग्नि और जल तत्व का समन्वय यानि सृष्टि की रचना। जीवन के लक्षण उभरने लगे। सभ्यता की संभावनाएं आकार लेने लगीं। नदी तट के अस्थायी डेरे, झोपड़ी में तब्दील होने लगे। बसाहट, सुगठित बस्ती का रूप लेने लगी। यहीं दृश्य में उभरी, लोक नायिका- बिलासा केंवटिन। बिलासा केवटीन का गांव आज बिलासपुर जिले के नाम से विख्यात है।
बिलासा देवी एक वीरांगना थीं. सोलहवीं शताब्दी में जब रतनपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी हुआ करती थी तो राजा कल्याण सहाय बिलासपुर के पास शिकार करते हुए घायल हो गए थे. उस समय बिलासा केवटिन ने उन्हें बचाया था. इससे खुश होकर राजा ने उन्हें अपना सलाहकार नियुक्त करते हुए नदी किनारे की जागीर उनके नाम लिख दी थी."
आज से लगभग 300 साल पहले बिलासपुर शहर नहीं था । निषाद संस्कृति के लोग नदी के किनारे बसा कराते थे। आखेटवाजी से आपना जीवन को एक दिशा देने के लिए काम करते थे अपने जीवना के पारंपरिक कार्यों में आयें दिन जगलों में निवास के साथ जीवन उपार्जन के लिए शिकार के साथ मछली मारने के काम करते थे। उस समय की बात है जब छत्तीसगढ़ को रतनपुरा के नाम से जाना जाता था । आरपा नदी के किनारे बसे निषाद संस्कृति के लोग में विलासा भी रहा करती थे निषाद संस्कृति में महिला और पुरुष को समान अधिकार था तो एक दूसरे के साथ मिलकर शिकार करते थे। चाहे वह मछली मारना हो या जंगल के रक्षा करना हो। बंशी नामक युवक ने एक बार बिलासा को पानी ने डूबने से बचाया था तब से बंसी और बिलासा दोनों साथ रहते थे । एक बार की बात है जब सभी लोग शिकार करने के लिए गए थे तो गाँव में कुछ महिला बच गई थी। उसी समय जंगली सुअर ने हमला कर दिया था । तब विलास ने उसे मारने का काम किया। तब से विलासा का नाम पूरा गाँव में फैल.......उस समय कल्याण्साय के राजा ने एक बार शिकार करने के लिए गया और घनघोर जंगल में चला गया और सिपाही पीछे छुट गए राजा एकेला पड़ गया । कुछ देर बाद प्यास लगाने के बाद नदी के किनार जाने लगा । तब तक जंगली सुअर ने उसे घायल कर दिया वह बड़ी ज़ोर ज़ोर से कराह रहा था । उस समय बंसी ने उसी रास्ते से आ रहा था घायल देख राजा को गाँव ले गया । विलासा ने उसे बहुत सेवा किया । राजा के ठीक हो जाने के बाद बिलासा और बंसी को साथ ले गया जहाँ पर बिलासा ने धनुष चला कर अपना करतब दिखाया । तो बंसी ने भला फेक कर दिखाया । बिलासा ने खाली हाथ नहीं लौटा जागीर ले कर लौटी । जो आज धीरे –धीरे । नगर के रूप ले लिया । उसे विलसा पुर के नाम से जाना जाता है
प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर आज महानगर का रूप ले रहा है। कलचुरीवंश की राजधानी रतनपुर बिलासपुर जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां महामाया देवी का मंदिर है। जो कि धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विख्यात है। जिले के बाहरी सीमाएँ रायपुर,दुर्ग,जांजगीर , आदि है । जिले की स्थापना 18मई 1998 में किया गया ।
इसी तरह 'बिलासा केंवटिन' काव्य, संदिग्ध इतिहास नहीं, बल्कि जनकवि-गायक देवारों की असंदिग्ध गाथा है, जिसमें 'सोन के माची, रूप के पर्रा' और 'धुर्रा के मुर्रा बनाके, थूंक मं लाड़ू बांधै' कहा जाता है। केंवटिन की गाथा, देवार गीतों के काव्य मूल्य का प्रतिनिधित्व कर सकने में सक्षम है ही, केंवटिन की वाक्‌पटुता और बुद्धि-कौशल का प्रमाण भी है। गीत का आरंभ होता है-
छितकी कुरिया मुकुत दुआर, भितरी केंवटिन कसे सिंगार।
खोपा पारै रिंगी चिंगी, ओकर भीतर सोन के सिंगी।
मारय पानी बिछलय बाट, ठमकत केंवटिन चलय बजार।
आन बइठे छेंवा छकार, केंवटिन बइठे बीच बजार।
सोन के माची रूप के पर्रा, राजा आइस केंवटिन करा।
मोल बिसाय सब कोइ खाय, फोकटा मछरी कोइ नहीं खाय।
कहव केंवटिन मछरी के मोल, का कहिहौं मछरी के मोल।
आगे सोलह प्रजातियों- डंडवा, घंसरा, अइछा, सोंढ़िहा, लूदू, बंजू, भाकुर, पढ़िना, जटा चिंगरा, भेंड़ो, बामी, कारी‍झिंया, खोकसी, झोरी, सलांगी और केकरा- का मोल तत्कालीन समाज की अलग-अलग जातिगत स्वभाव की मान्यताओं के अनुरूप उपमा देते हुए, समाज के सोलह रूप-श्रृंगार की तरह, बताया गया है। सोलह प्रजातियों का 'मेल' (range), मानों पूरा डिपार्टमेंटल स्‍टोर। लेकिन जिनका यहां नामो-निशान नहीं अब ऐसी रोहू-कतला-मिरकल का बोलबाला है और इस सूची की प्रजातियां, जात-बाहर जैसी हैं। जातिगत स्वभाव का उदाहरण भी सार्वजनिक किया जाना दुष्कर हो गया क्योंकि तब जातियां, स्वभावगत विशिष्टता का परिचायक थीं। प्रत्येक जाति-स्वभाव की समाज में उपयोगिता, अतएव सम्मान भी था। जातिगतता अब सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक प्रस्थिति का हथियार बनकर, सामाजिक सौहार्द्र के लिए दोधारी छुरी बन गई है अन्यथा सुसकी, मुरहा, न्यौता नाइन, गंगा ग्वालिन, राजिम तेलिन, किरवई की धोबनिन, धुरकोट की लोहारिन, बहादुर कलारिन के साथ बिलासा केंवटिन परम्परा की ऐसी जड़ है, जिनसे समष्टि का व्यापक और उदार संसार पोषित है।
अरपा-जवाली संगम के दाहिने, जूना बिलासपुर और किला बना तो जवाली नाला के बायीं ओर शनिचरी का बाजार या पड़ाव, जिस प्रकार उसे अब भी जाना जाता है। अपनी परिकल्पना के दूसरे बिन्दु का उल्लेख यहां प्रासंगिक होगा- केंवट, एक विशिष्ट देवी 'चौरासी' की उपासना करते हैं और उसकी विशेष पूजा का दिन शनिवार होता है। कुछ क्षेत्रों में सतबहिनियां के नामों में जयलाला, कनकुद केवदी, जसोदा, कजियाम, वासूली और चण्डी के साथ 'बिलासिनी' नाम मिलता है तो क्या देवी 'चौरासी' की तरह कोई देवी 'बिरासी', 'बिरासिनी' भी है या सतबहिनियों में से एक 'बिलासिनी' है, जिसका अपभ्रंश बिलासा और बिलासपुर है। इस परिकल्पना को भी बौद्धिकता के तराजू पर माप-तौल करना आवश्यक नहीं लगा।
आज भी बिलासा नामक वीरांगना के नाम पर कालेज बनाकर अलग अलग रूपों में पूरा सम्मान दिया जा रहा है।, कालेज ,अस्पताल , रंगमंच, पार्क आदि है निषाद संस्कृति के सभी उप जातियों के लिए सम्मान के साथ यह कहने के लिए नहीं थकते है की बिलासपुर निषाद संस्कृति के पहचान के आयाम के रूप में है । निषाद संस्कृति को आज हम सब को तालस करने की जरूरत है। निषाद संस्कृति अपने देश के आगे बढ़ाने में महत्तवपूर्ण भूमिका के साथ देश को विकास में सर्वपरी योगदान है ।
साहस और कर्तव्य निष्ठता की प्रतीक बिलासा देवी ।
के जीवन संघर्ष से हमें प्रेरणा लेने की जरूरत है ।।
जय निषाद संस्कृति ---जय भारत

कहार-संस्कृत में इसे हम स्कन्धहार कहते हैं, जिसका तात्पर्य होता है, वह जो अपने कंधे पर भार ढोता है। कहार जनजाति वह जनजाति है, जो कृषि कार्य (खेती-बाड़ी) का काम करता है, खास तौर से पानी के तालाब मे सिंघाडे़;ॅंजमत छनजेद्ध की पैदावार करने, मछली मारने, पालकी ढोने तथा घरेलू नौकर के रूप में कार्य करना, इन जाति के लोगों का मुख्य पेषा है। इस जाति के लोग मुख्य रूप से ऊपर उल्लेखित कार्य करते हुए पाए जाते हैं, एवं यही उनका परंपरागत पेषा है। विभिन्न प्रकार के कार्यांे को इनके द्वारा किए जाने के कारण यह स्वाभाविक ही है कि इनकी अलग-अलग जातियाँ एवं उपजातियों भी अलग-अलग नामों से अस्तित्व में आ गई होंगी, और वास्तविकता भी यही है। आज हम इस तरह के कार्य करने वाले लोगों को अनेक नामों से जानते हैं। कहार जाति के लोगों को ‘महरा’ (जो संस्कृत षब्द महिला से लिया गया है) के नाम से भी जाना जाता है। घरेलू काम करने से महिलाओं के बीच रहने के कारण ही इन्हें ‘महरा’ कहा गया। चँूकि इन्हें अपने मालिक के घर में, जिसके यहाँ ये काम करते हैं। मालकिन के षयनकक्ष या घर के भीतर जो महिला भोज होता है, वहाँ तक भी इन्हें आने-जाने की अनुमति होती है। कहार को ‘धीमर’ के नाम से भी जाना जाता है, जो कि संस्कृत षब्द ‘धीवर’ से लिया गया है। इसका अर्थ होता है, मछली मारने वाला। कुछ लोगों के अनुसार ‘धीमर’ षब्द संस्कृत के ‘धी’ षब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ होता है ‘बुद्धिमान’। जो कहार घरेलू नौकर के रूप में कार्य करते हैं वे मुख्य रूप से ‘बेहरा’ के नाम से जाने जाते हैं, जो कि अंगे्रजी षब्द ‘बीयरर’(ठमंतमत) का अपभ्रंष है। यही ‘बीयरर’ अपभ्रंष होकर बाद में ‘बेहरा’ के नाम से लोकप्रिय हो गया। दूसरे मत के अनुसार ‘बेहरा’ षब्द अंग्रेजी षब्द ‘बीयरर’ का अपभ्रंष नहीं है, बल्कि यह संस्कृत के षब्द ‘व्यवहार’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ होता है, ‘व्यवसाय’(ठनेपदमेे)। इनका एक दूसरा नाम ‘भोई’ प्रायः दक्षिण भारत में पाये जाते हंै। जैसे- तेलुगु और मलयालम में ‘बोयी’ और तमिल में ‘बोवी’ षब्द ही अपभ्रंष होकर ‘भोई’ बन गया। कांेकण भाषा में कहार को ‘भुयि’ कहा गया, क्यांेकि यह मूलतः ‘ब्वाय’ षब्द का अपभ्रंष है। यूरोपियन लोग अपने घरेलू नौकर को ‘ब्वाय’ कहकर बुलाते थे, वही कालान्तर में ‘भुई’ बन गया। बुंदेलखण्ड के क्षेत्र में कहार को ‘मच्छमारा’(डंबीीउंतं) के नाम से जाना जाता है। मच्छमारा का अर्थ होता है, मछली मारने वाला यानि कि जो मछली मारने का रोजगार करता हो। कई अन्य क्षेत्रों में इन्हें ‘सिंघारिया’(ैपदहींतपं) भी कहा जाता है, क्योंकि ये सिंघाडा़ उत्पादन के काम में भी संलग्न रहते हैं।

परंपराएँ

बडे़ जाति के लोगों के घरों में काम करने के फलस्वरूप, इनकी नस्ल को ज्यादा महत्व प्राप्त होने की संभावना रहती है। कहीं-कहीं तो जैसे बंगाल में मि. रिसले के कथनानुसार कहार जाति को ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, कुर्मी जाति में भी सम्मिलित कर लिया जाता है और इनके बच्चों को भी कुछ औपचारिक धार्मिक कर्मकाण्ड एवं जाति के बडे़ लोगों को भोजन कराकर ऐसा किया जाता है। इस प्रकार के उदाहरण हमें षायद ही देखने को मिलते हैं कि कोई भी ऊँची जाति का व्यक्ति कहार जाति में सम्मिलित होने के लिए इच्छुक रहा हो। ऐसा तभी सम्भव होता है, जब यदि कोई ऊँची जाति का व्यक्ति किसी कहार जाति के साथ अपना संबंध कर लिया हो, एवं उसको अपनी जाति से
बहिष्कृत कर दिया गया हो। इन प्रांतों में बाहर की जाति के लोगों को अपने समुदाय में सम्मिलित करने की परंपरा बिल्कुल भी अस्तित्व में नहीं है।
संदर्भ : द ट्राइब्स एंड कास्ट्स आॅफ नार्थ वेस्टर्न इण्डिया

भारत में रहने वाली मूल जनजातियों-जिन्हें देश के ‘मूल लोग’ माना जा सकता है-का इतिहास विविधतापूर्ण रहा है। आदम अवस्था के बाद इनकी अनूठी संस्कृति का उद्भव व विकास मानवशास्त्रियों का प्रिय विषय रहा है। गोंड; गोड़ जनजाति पर प्रस्तुत आलेख डब्ल्यू० क्रुक के द ट्राइब्स एंड कास्ट्स आॅफ नार्थ वेस्टर्न इण्डिया में उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है।
‘गोंड’ शब्द का अर्थ है-‘गौडा’ या ‘पश्चिमी कोसला’ के रहने वाले। मि० हिस्लप के अनुसार यह तेलुगू भाषा के ‘कोंडा’ (अर्थात् पर्वत) से लिया गया है। डाॅ० आॅपर्ट के अनुसार उन जनजातियों, जिनका नाम ‘को’ या ‘गो’ से प्रारम्भ होता है, जैसे - कोडूलू, कोंडा, गोंडा, गांडा, कुरावा इत्यादि, की व्युत्पत्ति गौडा द्रविड़ मूल के ‘को’, ‘कोंडा’ इत्यादि से हुई है, जिसका अभिप्राय ‘पर्वत’ होता है। जनगणना रिकार्ड में ‘गोंड’ के अन्तर्गत दो विशिष्ट जाति के लोगों को सम्मिलित किया गया है। एक मध्य भारत के पर्वतीय क्षेत्र के असली ‘गोंड’ और दूसरे इन प्रान्तों के पूर्वी जिलों के गोंड़, जिनको प्रायः कहार और मल्लाह जैसी मछलीमार जनजातियों से सम्बद्ध माना जाता है और जो घरेलू नौकर, पत्थर-तराशर या भड़भूजे होते हैं। जनगणना के विस्तृत विवरण में इन दोनों जातियों को इस तरह मिश्रित कर दिया गया है कि उनका विश्लेषण आवश्यक नहीं प्रतीत होता।

मध्य भारतीय गोंड
झाँसी एवं ललितपुर के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर इन प्रांतों में गोंडों की संख्या कम है। लेकिन यदि दक्षिणी मिर्जापुर के माँझी एवं खरवार के रिकार्ड पर हम नजर डालते हैं, तो पाते हैं कि ये भी मुख्यतः ऊँचे गोंड जाति से ही संबंध रखते हैं, एवं पहाड़ी के पश्चिमी इलाके में गोंडों के संगठन आज भी मौजूद हैं। मि० हिस्लप के अनुसार गोंड अपने आप को साढे़ बारह जातियों या वर्गों में बाँटते हैं, एवं स्वयं को हिन्दू बताते हैं। ये जातियाँ हैं - राजगोंड, रघुवाल, दडावे, कतुल्या, पाडल, धोली, ओझयाल, ठोटयाल, कोयलाभूतल, कोईकोपल, कोलम, मदयाल एवं निम्न जाति के पडाल को आधा गोंड माना जाता है। प्रथम चार को कोइतर के नाम से सामूहिक रूप से जाना जाता है, जोकि सबसे ऊँचे स्तर के गोंड माने जाते हैं।

राजगोंड
इस क्षेत्र में आज जो जनजाति जीवित हैं, उन्हें राजगोंड के रूप में जाना जाता है। राजगोंड झाँसी जिले में भी पाए जाते हैं। ये निम्नलिखित गोत्र (वर्ग) में विभाजित हैं-सोहम, चगबा, मरकम, पोसम, कोरम, देवार। राजगोंड के बारे में मि० हिस्लप का कहना है कि राजगोंड को इस नाम से इसलिए जाना जाता है, क्योंकि इनके अनेक परिवार काफी उन्नति कर राजशक्ति प्राप्त किए हैं। ये लोग काफी अधिक जनसंख्या में नागपुर प्रांत के मैदानी एवं पहाड़ी इलाकों में दूर-दूर तक फैले हुए हैं। ये बरार एवं वर्दा के दक्षिणी जंगलों में भी बहुतायत में पाये जाते हैं। नर्मदा के उत्तर में भी हमें इनकी काफी जनसंख्या मिलती है। इस क्षेत्र में रघुवाल एवं दाडावे जाति के गोंड की संख्या काफी सीमित है। ये दोनों जाति के लोग मुख्य रूप से छिंदवाडा जिले में पाए जाते हैं। इन तीनों गोंड जाति के लोग मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर हैं। कृषि कार्य इनका मुख्य धंधा है। ये एक-दूसरे के साथ भोजन तो करते हैं, लेकिन आपस में शादी-विवाह नहीं करते। कतुल्या जिनकी संख्या ज्यादा नहीं है, छोटे-छोटे समुदायों में यत्र-तत्र निवास करते हैं। इनमें उन जनजातियों को शामिल किया जाता है जो मुख्य रूप से कोइतर वर्ग से संबंध रखते हैं तथा हिन्दू धर्म एवं रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। ये स्वयं को क्षत्रिय कहते हैं एवं जनेऊ धारण करते हैं, तथा जरूरतमंद राजपूत लड़कियों के साथ शादी करने के लिए भरसक प्रयत्न करते हैं। भोजन तैयार करने से पहले पवित्र होने के लिए अपने शरीर पर जल छिड़कते हैं। यदि दिन में भोजन करते समय उनके नजदीक कोई कौआ या विचित्र प्राणी आ जाता है, तो वे अपने भोजन को अशु़द्ध मानकर फेंक देते हैं। यह परंपरा धनी लोगों के बीच कुछ ज्यादा ही प्रचलित है। ये गोंड काफी महत्त्वाकांक्षी होते हैं, एवं स्वयं को राजपूत या क्षत्रिय साबित करना चाहते हैं।
इस तरह के प्रयास जिन्हें अन्य कोइतर घृणास्पद मानते हैं,धनी लोगों में ज्यादा पाये जाते हैं। खैरागढ़ के जमींदार राजा, जिसके एक या दो पीढ़ी पूर्व तक नाम से स्पष्ट है कि वे गोंड जनजाति के हैं, हिन्दू धर्म में समाहित हो गये। इसी तरह के परिवर्तन बस्तर, माण्डला और अन्य छोटे-छोटे राजवंशों में भी पाये जाते हैं। अपने को राजपूतों से संबद्ध करने की प्रवृत्ति महत्त्वाकांक्षी गोंडों में ही नहीं बल्कि मालवा के भीलों तथा दकन के घुमन्तू कैकाडियों में भी पायी जाती है, जो स्वयं को यादव या पवार अथवा क्षत्रियों के उच्च वर्ग के समकक्ष मानते हैं। ठीक यही बात मिर्जापुर के ‘खरवार’ जाति में देखी गई है, जिन्होंनें अपने लिए ‘बैनबन’ नामक क्षत्रिय (राजपूत) जाति गढ़ ली है, जो चन्देल सदृश सम्मानित वंश से ब्याह संबंध स्थापित करने में सफल हो गये।

शारीरिक संगठन (बनावट)
गोंडों के शारीरिक गठन के बारे में मि० हिस्लप लिखते हैं-”वे सारे यूरोपियनों की औसत ऊँचाई से थोडे़ छोटे होते हैं और रंग में आम हिन्दुओं से काले होते हैं। यद्यपि उनका शरीर समानुपातिक होता है, पर दिखने में वे भद्दे लगते हैं। उनका सिर गोल, नथुने चपटे, मुँह चैड़ा, होंठ मोटे, बाल सीधे व काले, दाढी़ व मूँछें पतली होती हैं। ऐसा माना जाता है कि मध्यभारत के मूल जनजातियों में ऊन के सदृश बाल होते हैं, पर यह सही नहीं है। हजारों गोंड़ों, जिनको मैंने देखा है, किसी के भी बाल नीग्रो लोगों के समान नहीं थे। हाँ, कुछ ब्रितानी लोगों के समान उनके घुँघराले बाल अवश्य होते हैं। पर किसी भी जंगलवासी में मैंनें अफ्रीकी वंश की समानता नहीं पायी। इसके विपरीत उनके बाल व बनावट मंगोलियन सदृश हैं।“
कैप्टन फोर्सिथ लिखते हैं-”उनकी औरतों में आपस में ही पुरुषों की तुलना में ज्यादा विभिन्नता पायी जाती है। गोंड औरतें कोरकुस की तुलना में साफ रंग की तथा कम मांसल होती हैं। परन्तु देश के विभिन्न भागों की गोंड औरतें दिखने में अलग-अलग लगती हैं। उनमें कई, जो मैदानों के निकट खुले भागों में रहते हैं, मजबूत कद-काठी की और पुरुषों की तुलना में सुन्दर होती हैं। यहाँ उनमें हिन्दू खून होने की संभाव्यता है। जबकि अन्दरूनी भागों की गोंड औरतें आदमी की अपेक्षा बंदरों से ज्यादा मिलती-जुलती हैं। सबके नाक-नक्श चिह्नित व कठोर होते हैं। कभी-कभार ही लड़कियाँ कमसिन होती हैं, यौवन पार करते ही सभी की तरह हो जाती हैं। कठोर जीवन व शिकार करने के अतिरिक्त पुरुषों के समान सारे श्रम करना इसके लिए उत्तरदायी है। पर वे अच्छी तरह सजकर रहती हैं। वे अधिकांशतः नीले रंग का छोटा पेटीकोट पहनती हैं, जिसके दोनों टाँगों के बीच बँधा होने से जाँघों से नीचे का हिस्सा नंगा रहता है। शरीर के ऊपरी हिस्से में वे सफेद कपड़ा लपेटती हैं, जिसका एक सिरा ओढ़नी की तरह प्रयुक्त होता है। पूर्वी क्षेत्र की कोरकु औरतें, हिन्दू धर्मावलम्बी गोंडों की तरह चोली भी पहनती हैं। गोंड औरतें अपनी टाँगों में आसमानी या नीले रंग के विभिन्न प्रकार के ‘गोदना’ गुदवाती हैं। प्रधान जाति के लोग इस कला के माहिर हैं और वे इन जनजातियों द्वारा अपनाये जाने वाली सजावटी कला के मात्र डिजाइन ही चित्रित करते हैं। लड़कियों के शादी योग्य हो जाने पर ही गोदना मुँह चैड़ा, होंठ मोटे, बाल सीधे व काले, दाढी़ व मूँछें पतली होती हैं। ऐसा माना जाता है कि मध्यभारत के मूल जनजातियों में ऊन के सदृश बाल होते हैं, पर यह सही नहीं है। हजारों गोंड़ों, जिनको मैंने देखा है, किसी के भी बाल नीग्रो लोगों के समान नहीं थे। हाँ, कुछ ब्रितानी लोगों के समान उनके घुँघराले बाल अवश्य होते हैं। पर किसी भी जंगलवासी में मैंनें अफ्रीकी वंश की समानता नहीं पायी। इसके विपरीत उनके बाल व बनावट मंगोलियन सदृश हैं।“
इन गाँवों से गुजरने वाले यात्री कभी-कभी गोदना क्रिया की पीड़ा से होने वाली चीखें सुन सकते हैं। अन्य जंगली जातियों की तरह ही ये भी जिस चीज को आभूषण मानते हैं, उससे शृंगार करते हैं। जिसमें गुणवत्ता की बजाय मात्रा को ज्यादा प्रधानता दी जाती है। धनी औरतें पैरों व हाथों में चाँदी और अन्य लोग पीतल, लोहे व रंगीन काँच के छल्लों से ढँकी रहती हैं। कान व नाक में छल्ले तथा गले में सिक्कों व कौड़ियों की भारी गलहार (माला) आमतौर पर पहने जाते हैं और अपने बालों में कई अवसरों पर बकरी व अन्य जानवरों के बाल गूँथती हैं।“

घरेलू उत्सव-विवाह
”मध्य प्रान्त का गजट“ नामक दुर्लभ पुस्तक से गोंड लोगों के घरेलू रीतिरिवाजों का वर्णन उद्धृत करना उपयुक्त है। गोंड जनजातियों में उत्सव विभिन्न प्रकार से मनाए जाते हैं। ”इनमें शादी-विवाह एक नहीं, सात तरीके से किए जाते हैं। कोई शादी साधारण तरीके से कर दी जाती है, तो कोई शादी काफी पवित्रता एवं शुद्धीकरण के साथ की जाती है। जब गोंड जनजाति का कोई भी व्यक्ति अपनी बेटी की शादी के लिए वर ढूँढता है, तो प्राथमिकता वह अपनी बहन के बच्चों को देता है। अपनी बहन का पुत्र ही इनकी बेटी के लिए सुसंगत एवं योग्य पति होता है। यह नियम उस स्थिति में बंधनकारी होता है, जब भाई की संतान लड़की हो एवं बहन की संतान लड़का हो। इसके विपरीत स्थिति में भी ऐसा किया जा सकता है। ऐसा करने के बाद यह समझा जाता है कि उस व्यक्ति ने बहुत ही सही एवं महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। ऐसी परंपरा इसलिए भी प्रचलन में लायी गयी ताकि शादी किसी अनजान की अपेक्षा अपने ही जान-पहचान के घर में हो जाए। ऐसा करने से शादी का खर्च भी काफी कम आएगा। यदि गरीब वर्ग का कोई व्यक्ति दहेज देने की स्थिति में नहीं है, तो दुल्हन, दूल्हा के बाप की सात- आठ महीना से लेकर तीन साल तक सेवा करती है, कभी-कभी इससे ज्यादा भी। ऐसा तब होता है, जब शादी के लिए बात पूरी तरह पक्की हो जाती है। शादी होने वाले लड़के को घर के बाहर वाले कमरे में रहने को कहा जाता है तथा उसे घर एवं बाहर दोनों प्रकार के कार्य करने की जिम्मेदारी दी जाती है। माहवारी के समय लड़की के साथ किसी भी प्रकार का शारीरिक संबंध स्थापित करने पर पाबंदी लगायी जाती है।
इसी गोंड जाति के विवाह से संबंधित एक और विवरण हमें देखने को मिलता है। यदि किसी लड़की की शादी उसके संबंधियों द्वारा करा दी जाती है, इस स्थिति में यदि लड़की को उसका पति पसंद नहीं है, तो वह लड़की अपनी पसंद के जीवन-साथी के साथ प्रथम पति के घर से भागकर दूसरी शादी कर सकती है। लेकिन ऐसा कभी-कभार ही होता है। इन जनजातियों के बीच एक स्थापित परंपरा यह भी है कि यदि इनकी शादीशुदा औरतों को अपना अलग रास्ता चुनने की क्षमता है, तो वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र होती हैं, तथा गाँव का मुखिया इस तरह की व्यवस्था या समझौता कराने में उसकी मदद करता है कि दोनों अलग-अलग रहकर भी संतुष्ट रह सकें। इसी से संबंधित एक अन्य विवाह परंपरा और भी है कि शादीशुदा लड़की अपने पिता के घर से भागकर अपनी पसंद के दूसरे पुरुष के साथ रहना शुरू कर देती है, तो इस स्थिति में केवल उसके पूर्व (त्यागे हुए) पति को यह अधिकार प्राप्त होता है कि वह लड़की के ऊपर अपना दावा पेश कर सकता है अथवा जबरदस्ती अपने घर ले जा सकता है। इसके अतिरिक्त लड़की का भाई यदि समर्थ है, तो उसको भी यह अधिकार होता है कि वह जबरदस्ती लड़की को अपने घर ले जा सकता है और अपने घर में लड़की के हितों का ध्यान रखते हुए बंदी के रूप में रख सकता है, जब तक वह पूरी तरह पूर्व घटना को भूलकर अपने घर में रहने के लिए राजी नहीं होती। जब कभी लड़की की शादी उसकी पसंद के विपरीत अथवा गरीब लड़के के साथ कर दी गई हो या दोनों में मेल नहीं खाता हो, तथा उसके सगे संबंधी तथा दोस्त सीमित हों, इस अवस्था में असंतुष्ट लड़की को बहला-फुसला कर भगा ले जाने का कार्य सफलतापूर्वक किया जा सकता है। लेकिन यह नियम के अनुसार अपराध माना जाता है। यदि किसी लड़की का कोई संबंधी नहीं है, तो वह अपनी पसंद के लड़के से शादी करने का चुनाव कर सकती है। इस स्थिति में वह लड़का अपनी रजामंदी, उस लड़की को चूड़ियाँ पहनाकर तथा गाँव के बुजुर्ग व्यक्तियों को भोजन करा कर देता है। शादी के उपरांत यदि यह साबित होता है कि लड़की अच्छे चरित्र की नहीं है अथवा अन्य कमियाँ हैं तो वह उसे छोड़ भी सकता है। लेकिन उसे अपने घर में तब तक संरक्षण देना पड़ता है, जब तक वह उसकी दूसरी शादी कहीं और नहीं कर देता।

विधवा विवाह
गोंड जाति के लोगों में यह प्रथा मान्य है कि यदि कोई औरत विधवा हो जाती है तो उसकी दुबारा शादी की जा सकती है। इस प्रकार की शादी दो प्रकार से की जाती है। प्रथम व्यवस्था में विधवा औरत को स्वतंत्रता प्राप्त है कि वह अन्य व्यक्ति, जो उसे पसंद हो, उसके साथ शादी कर सकती है। दूसरी व्यवस्था यह है कि यदि दूसरे व्यक्ति से शादी नहीं कर सकती या करना नहीं चाहती है, तो इस स्थिति में मृत पति के छोटे भाई अर्थात् देवर से उसकी शादी करा दी जाय। इन दोनों प्रकार की शादियाँ कम खर्च तथा साधारण तरीके से की जाती हैं। इसके लिए उसका होने वाला पति अपनी होने वाली पत्नी को चूड़ियाँ प्रदान करता है, तथा गाँव के बुजुर्ग व्यक्तियों को भोजन कराता है। इस व्यवस्था में बड़े भाई की शादी छोटे भाई की विधवा से करने का विधान नहीं है। गोंड जाति के लोगों में प्रथा है कि ये लोग उतनी पत्नियाँ रख सकते हैं, जितनी की वे भरण-पोषण कर सकते हैं।

दाह-संस्कार
दाह-संस्कार इन जाति के लोगों में काफी सम्मान के साथ किया जाता है। लेकिन सीमित खर्च का भी ध्यान रखा जाता है। ऊँच जाति के लोग ही ऐसे मौके पर ज्यादा खर्च करते हैं। इनके दाह- संस्कार के नियम के अनुसार यदि 50 साल से ज्यादा उम्र के व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसके शव को जलाए जाने की परंपरा है। गोंड जाति में मरी हुई स्त्री को जलाये जाने की प्रथा नहीं है, बल्कि इन्हें गाड़ा जाता है, चाहे वो किसी भी उम्र की क्यों न हो। लेकिन जैसा कि हम जानते हंै कि पूरी तरह से शिक्षित नहीं होने के कारण किसी व्यक्ति के उम्र के बारे में इन्हें ठीक-ठीक जानकारी नहीं होती है कि मरा हुआ व्यक्ति वास्तव में कितने वर्ष का होगा। पहले गोंड लोगों के बीच यह परंपरा थी कि मरे व्यक्ति को वे उसी घर में नीचे जम़ीन में गाड़ देते थे, जिस घर में उस व्यक्ति की मृत्यु होती है। जम़ीन को काफी नीचे तक खोदा जाता था ताकि कुत्ते लाश को जम़ीन से निकालकर बाहर न ले जाएँ। लेकिन अब उनमें यह परंपरा नहीं है। अब मरे हुए व्यक्ति का दाह-संस्कार करने के लिए गाँव से थोड़ी दूर पर श्मशान घाट बना दिए गए हैं, जहाँ पर गाँव के मरे हुए प्रत्येक व्यक्ति का दाह संस्कार किया जाता है। मरे हुए व्यक्ति को जम़ीन में नीचे गाड़ दिया जाता है, तथा उसके सिर को दक्षिण एवं पैर को उत्तर तरफ रखा जाता है। ऐसा यह सोचकर किया जाता है कि मरा हुआ व्यक्ति ईश्वर के घर गया है, जो कि संभवतः उत्तर दिशा की ओर है। लेकिन गोंड, जैसा कि प्रतीत होता है, मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में किसी भी प्रकार के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते हैं या आत्मा के अमरणशील होने का भी इनके पास कोई सिद्धांत (ज्ीमवतल) नहीं है। इनकी मान्यता है कि प्रत्येक व्यक्ति का जन्म कुछ वर्षों के लिए ही होता है, एवं वह अपना निर्धारित समय बिताकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। गोंड जाति में यदि घर के पिता की मृत्यु हो जाती है, तो यह माना जाता है कि जब तक इनका दाह-संस्कार नहीं किया जाता है, तब तक वे अपने घर में विराजमान रहते हैं। इनकी मृत्यु के बाद इनका क्रिया-कर्म किसी भी वक्त शुरू किया जा सकता है, जो महीने-दो महीने अथवा साल-दो साल तक भी किया जा सकता है। इस काम में घर में सिर्फ मरे हुए व्यक्ति की आत्मा की ही पूजा होती है। ऐसी ही मान्यता के अंतर्गत भोजन का एक हिस्सा मरे हुए व्यक्ति के लिए भी निकालकर अलग रख दिया जाता है। इनका ऐसा विश्वास है कि मरे हुए व्यक्ति की आत्मा घर में ही विराजमान होती है एवं अपने परिवार के लोगों की निगरानी करती है। मृत्यु के बाद, यदि मृत व्यक्ति के संबंधी हैसियत रखते हैं, तो मृत व्यक्ति के शव के पुतले को कपडे़ में लपेटकर थोड़ी-सी हल्दी लगाकर, कपड़े में कुछ पैसे बांध दिए जाते हैं, एवं उन्हें घर के किसी धरन (इमंउ) से लटका दिया जाता है, तथा इसे तब तक वहीं पर छोड़ दिया जाता है, जब तक कि मृत व्यक्ति की आत्मा को लिटाने का समय नहीं आ जाता है। यह कार्य बैगा द्वारा किया जाता है। वह कपड़े को हटाता है, एवं बकरे या सुअर के मांस के साथ गाँव के देवता को इसे भेंट चढ़ाता है। इसके बाद गाँव के बडे़ लोगों और
संबंधियों को भोजन कराया जाता है, एवं इसी प्रकार क्रिया-कर्म की समाप्ति होती है।

धर्म
झाँसी में इन जाति के लोगों के द्वारा सभी साधारण प्रकार के हिंदू देवताओं जैसे महादेव, भवानी, राम, कृष्ण, महावीर तथा हरदौल की पूजा की जाती है। लेकिन इनके असली देवता गोंड़ बाबा हैं। ये लोग पूरी तरह से हिन्दूवाद में विश्वास करते हैं।
मि० हिस्लप के कथनानुसार इस जाति के लोग देवताओं की पूजा अपने समुदाय के अनुसार अलग-अलग करते हैं, और इनके अलग-अलग देवता भी अनेक हैं। लेकिन सात देवताओं से अधिक का नाम किसी ने नहीं लिया। सबसे अधिक लोकप्रिय देवता हैं-
दूल्हा देव; नारायण देव; सूरजदेव; मातादेवी; बड़ादेव; खैरमाता; ठाकुरदेव एवं घनश्यामदेव। इनके अतिरिक्त गोंड जाति के लोग जंगलों में पाये जाते हैं, तथा जंगल की पूजा करते हैं, जहाँ विविध आत्माओं के साथ रहते हैं, एवं इनमें शैतानी शक्तियाँ होती हैं, और वे इन शक्तियों के प्रयोग के लिए उद्यत रहते हैं। इनमें इन शक्तियों से बुरी आत्माओं को समाप्त करने की अद्भुत शक्ति होती है। आत्माओं के आह्नान के लिए ये लोग एक संतसमाधि, तीर्थस्थान या पाल का निर्माण करते हैं। इसका वैसी जगह पर निर्माण किया जाता है, जो या तो स्वयं ही चयनित की गयी हो या उनके पूर्वजों ने उस जगह को पहले से ही तय कर रखा हो। इस स्थान पर कुछ विशेष प्रकार के धार्मिक कर्म-कांड किए जाते हैं। इस दौरान किसी-किसी दिन थोड़ी-बहुत भेंट भी चढ़ायी जाती है। ये संतसमाधि, तीर्थस्थान या पाल कभी-कभार सिर्फ बाँस के होते हैं जिसमें कपड़े के एक टुकड़े को बाँस के एक छोर पर बाँध दिया जाता है। पत्थर के कुछ टुकड़े या कपड़े के कुछ टुकड़ों को पेड़ की टहनियों से बाँध दिया जाता है। यह माना जाता है कि मृत व्यक्ति की आत्मा ने अब अपनी शरण ले ली है, एवं गोंड जाति में यदि कोई महत्त्वपूर्ण उत्सव मनाया जाता है, तो हर अच्छी चीज का एक अंश उस आत्मा का हिस्सा अर्पित किया जाता है। माण्डला में ऐसी मान्यता है कि ठाकुरदेव घरेलू देवताओं के प्रतिनिधि हैं, जो घर व खेत को सुरक्षा प्रदान करते हैं। इनका अपना कोई घर नहीं होता, लेकिन इनकी श्रेष्ठता इस बात में है कि ये सभी जगह विद्यमान रहते हैं और शायद यही कारण है कि इनकी कोई मूर्ति नहीं है। रामगढ़ में भी इस देवता को बहुत सम्मानजनक एवं श्रद्धा के साथ देखा जाता है। साथ-साथ यह भी माना जाता है कि इनके अनेक रूप हैं, शाहपुर तालुका के एक गाँव को भी उनके आराध्य देव का प्रिय स्थल माना गया है। कई बार छोटी-छोटी भेंटें चढ़ायी जाती हैं, जिसमें बैगा को काफी फायदा होता है।
पूरे रामगढ़ में, एवं माण्डला के कुछ भागों में घनश्याम देव की पूजा इस जाति के लोगों द्वारा बड़े आदर एवं सम्मान के साथ की जाती है, एवं गाँव से करीब सौ गज की दूरी पर इनके लिए एक झोंपड़ी बनाई जाती है। इन्हें फसल के रक्षक के रूप में देखा जाता है तथा कार्तिक माह (नवंबर) में पूरा गाँव मंदिर में इनकी पूजा के लिए एकत्रित होता है। बाँस के एक छोर पर लाल या पीले रंग के कपडे़ का ध्वज बाँध दिया जाता है, एवं उस बाँस को एक कोने में जमीन में गाड़ दिया जाता है। इसके आस-पास पत्थर के कुछ टुकड़े रखकर वहाँ सिंदूर लगा देते हैं। यह खासतौर से घनश्यामदेव जी के सम्मान में किया जाता है। सूअर या मुर्गे की बलि दी जाती है। माना जाता है कि घनश्याम देव प्रत्येक पूजा करने वाले व्यक्ति के सिर पर सवार हो जाते हैं।
गोड़िया, गुड़िया-इनका मुख्य व्यवसाय मछली मारना एवं खेती करना है। ये पूर्वी जिलों में मुख्य रूप से पाए जाते हैं, जो कई मायनों में बिहार के गोनरी या गुनरी के समान होते हैं। इन्हें मुख्य रूप से मल्लाह की उपजाति माना जाता है। लेकिन इनकी औरतें अलग चरित्र की होती हैं। ‘पाँचोपीर’ इनके कुलदेवता हैं। कुछ लोग जलदेवता की भी पूजा करते हैं, जो भूरे दाढ़ी वाले ‘कालू बाबा’ के नाम से जाने जाते हैं, तथा गंगाजी के बेलदार के नाम से भी जाने जाते हैं।
संदर्भ : द ट्राइब्स एंड कास्ट्स आॅफ नार्थ वेस्टर्न इण्डिया

धीमर, कहार, भोई पालेवार, बरौआ, एवं मच्छंदर........इन सभी जातियों का संबंध मच्छुआरे एवं पालकी ढोने वाली जातियों से है। 1911 में मध्य प्रांतों एवं बरार में इनकी कुल जनसंख्या करीब 2ए84ए000 के आस-पास थी, चूँकि मराठा जिलों मंे इनकी संख्या सर्वाधिक है। प्रांत के उत्तर में धीमर की जगह कहार एवं मल्लाह जाति के लोग पाए जाते हंै। दूसरे षब्दों में यदि कहें तो हम कहंेगे कि प्रांत के उत्तर में धीमर को कहार या मल्लाह कहा जाता है। जबकि पूर्व या छत्तीसगढ़ में इन्हें केवट कहा जाता है। यद्यपि इन जातियों के बीच काफी अंतर पाया जाता है। कुछ क्षेत्रांे मंे कहार एवं केवट धीमर की ‘उपजातियाँ’ बन गयी हैं। देष के कुछ भागों मंे भोईयो तथा धीमर जाति को अलग जाति का माना जाता है। लेकिन मध्य प्रांत में इनके बीच किसी भी प्रकार का भेद नहीं माना जाता है, इन्हें दोनो नामों से बुलाया जाता है। भोई का मुख्य रूप से संबंध पालकी ढोने के कार्य से है। इनका मुख्य कार्य पालकी ढोना होता है। जबकि धीमर का मुख्य धंधा मछली मारना है। धीमर षब्द संस्कृत षब्द धीवार का अपभं्रष है। धीमर का अथर््ा होता है, मच्छुआरा षब्द भोई (दक्षिण भारतीय षब्द ‘‘तेलगू एवं मलयालम बोई तथा तमिल बोवी’’) है। कांेकण मंे इस जाति के लोगों को कहार भूई कहा जाता है।पालेवर चांदा के तेलगु मच्छुआरे का नाम है। मच्छुआरे का अर्थ होता है, वह जो मछली पकड़ता है।

उपजातियाँ
इन जाति का अनेक उप-विभाजन स्थानीय या रोजगार के आधार पर होता है। रोजगार आधार पर विभाजित नाम हैं, सिंघारिया जिसका अर्थ है वे जो सिंघाडा़ का उत्पादन करते हंै, नाधा, जो धाराओं के किनारे पर रहते हैं, टांकीवाला या तेज करने वाला जो पत्थरांे को नुकीला बनाने का काम करते हैं, झींगा जो झींगा मछली पकड़ने का काम करते हंै, बंसिया तथा सराई (बंसी या सराई, जो मछली पकड़ने के लिए बाँस का डंडा होता हैं,) बंधाईया जो रस्सी बनाने का काम करते हैं तथा धुरिया जो भूने हुए चावल बेचने का काम करते हैं। इनका कहना है कि इनके असली पूर्वजों की उत्पति महादेव(भगवान षिव) द्वारा की गई थी, एक दिन भगवान शिव एवं पार्वती जी भ्रमण के लिए निकले थे। भ्रमण करते-करते जब पार्वती जी थक गई थीं तो उन्हें पालकी पर बिठाकर ले जाने के लिए महादेव ने धुरिया जाति के लोगांे की एक मुठी धूल से उत्पति की। छत्तीसगढ़ में इन्हें अलग जाति के रूप में देखा जाता है। ठीक इसी प्रकार अन्य सोंझारा धीमर सोने की धुलाई करने का काम करता है जिसे अलग जाति सोझारा रूप में मान्यता प्राप्त है। कसधोनिया धीमर नदी मंे डुबकी लगाकर उसके अंदर से पैसा निकालने का धंधा करते हैं। जब कोई तीर्थयात्री किसी पवित्र नदी में पैसा फेंकता है, तो इस जाति के लोग षीघ्र पानी मंे डुबकी लगाकर पैसा निकाल लेते हैं। गोड़िया उपजाति गोंड जाति से ही उत्पन्न हुई है, लेकिन मध्य प्रांतांे में इनकी संपूर्ण जाति गोंड या कोलस से ही उत्पन्न हुई है, जिनका मुख्य पेषा पालकी ढोना है। सुवारा उपजाति के लोगांे का नाम सुअर पर रखा गया है, चूँकि इस उपजाति के सदस्य सुअर एवं जानवरांे के गंदे मांस खाते हंै। समाज में इनका निम्न स्थान होता है। ठीक इसी प्रकार गदहेवाले धीमर गदहा पालते हंै एवं उपजाति के लोगों द्वारा इन्हें काफी तुच्छ दृष्टि से देखा जाता है और इनके घर का भोजन कोई नहीं खाता है। ये लकडी़ को ढोने के लिए गदहे का इस्तेमाल करते हैं। तथा शादी के समय में अपनी दूल्हन को भी गदहे पर बिठाकर ले जाते हैं। भनारे धीमर का नाम भंडारा नामक षहर पर रखा गया है।

बहिवैवाहिक समूह
बहिवैवाहिक समूह के लोग भी लौटकर वापस आते हैं, ये हैं, बाघमार (बाघ की हत्या करने वाले)। ओझा से ओझवाः गुरु पहचान, जो अपने षिक्षक को जानता है, मिदोइया, चार दीवारी का पहरेदार; गिद्धवे, गिद्ध; कोल्हे या सियार; गदेखाया, गदहा खाने वाला; कस्तुरे; कुछ नाम षहर या गाॅंवों से, जैसा कि तुमसोर के तुमसार से; नागपुर से नागपुरकर; तथा कुछ अन्य जाति से जैसे मडगी, भोयर, पिंडारिया, पिडारी से; गोड़िया, ‘‘गोंड’’ तथा गोढाली; तथा कच्छवाहा, एक राजपूत जाति।

विवाह
धीमर जाति के लोगों में एक ही संप्रदाय के लोगों के बीच षादी नहीं होती है। प्रथम भतीजों के बीच भी षादी नहीं हो सकती थी। बहुत से इलाकांे मंे कोई भी परिवार तब तक अंतर्विवाह नहीं करता था जब तक उन्हें इस बात की पूरी जानकारी नही हो जाती थी कि इनके बीच कभी संबंध रहा है।
मंडला के गोविंद मोरेष्वर कहते हैं कि नाधा एवं केहेरा उपजाति के बीच अंतर्विवाह नहीं होता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे उपजाति की लकडी़ से षादी करना चाहता है तो वह अपने समाज को दावत (भोजन खिलाना)उसे अपनी जाति मंे षामिल कर सकता है। षादी में दो परिवार बेटियों का आदान प्रदान कर सकते हैं। हिंदुस्तानी जिलों की बारात में महिलाओं को जाने का प्रचलन नहीं है। जबकि मराठा जिलों में इस तरह का प्रचलन है। चांदा के भनारा धीमर के लोगों में षादी दूल्हा या दूल्हन किसी के घर पर हो सकती है। यदि दूल्हा के घर पर षादी होती है तो, लड़की वाले 16 रुपये दूल्हा को देते हैं यदि षादी दूल्हन के घर पर हो रही है तो दूल्हा वाले को 20 रु दूल्हन को देने हंै, ताकि षादी का खर्च पूरा हो सके। चांदा के गरीब धीमरों के बीच एक यह भी परपंरा है कि खर्च से बचने के लिए षादी अति साधारण तरीके से हो जाती है। दूल्हा, दूल्हन को अपनेे घर बिना किसी उत्सव किये ले जाता है। वह लड़की के पिता को 1 से 4 या 20 पैसा देता है। ताकि अपने समुदाय के सभी लोगांे को दावत देते सके। इसके बाद लड़का के घर में लड़की पत्नी के रूप में रहने लगती है। काफी लंबे अंतराल या यांे कहे कि बुढ़ापा में धार्मिक उत्सव इसलिए किया जाता है कि दोनों पति-पत्नी मरने के पहले षादी के बंधन मंे बंध चुके हैं। इसी तौर-तरीके में दादा-दादी, माता-पिता एवं बच्चों की भी षादी साथ-साथ की जाती है। सिंघारिया धीमर जिनका मुख्य कार्य सिंघाढ़ा का उत्पादन करना होता है, इनकी षादी के समय एक घड़ियाल का मांस खाना आवष्यक होता है। सोंझारा या जो सोने की सफाई करने का काम करते हैं, उन्हें भी एक घड़ियाल को षादी के पहले पालकर उसकी पूजा करना आवष्यक होता है, और जब षादी समाप्त हो जाती है, तो उस घड़ियाल को वापस उसी नदी मंेे छोड़ दिया जाता है। यह स्वाभाविक ही है कि जिस जाति के लोगों के कार्य का संबंध जल से संबंधित होता है, वे जल में रहनेवाले किसी प्रसिद्ध जानवर की पूजा या सम्मान प्रदान करते हैं और पूरे विष्व में जल में डुबकी लगाने वाली जाति में विवाह-षादी के उत्सव पर जल में रहने वाले किसी पवित्र जानवर के मंास को खाने की परंपरागत परंपरा है। धीमर जाति के लोगों में षादी के दौरान दूल्हा के कपड़े से एक जाल एवं सिदोरी (पक्का भोजन) दुल्हन के आँचल के साथ बांधने की भी प्रचलित परंपरा है, फिर उन दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ने को कहा जाता है। जो इस बात को दर्षाता है कि दोनों साथ-साथ नदी में मछली मारने जा रहे हैं लेकिन इसी बीच दूल्हन का भाई उन्हें रोकने के लिए आता है। यह भी परंपरा के अंतर्गत ही है। मंडापा जाति के लोगों में परंपरा है कि षादी के दौरान एक सूअर की हत्या कर दूल्हन के दरवाजे के सामने उसे जमीन में खोदकर गाड़ दिया जाता है, एवं मिटट्ी से पुनः उस जगह को बराबर कर दिया जाता है तथा दूल्हा एवं दूल्हन इसके ऊपर पैर रखकर अपने कमरे में प्रवेष करते हैं।

विधवा विवाह एवं तलाक
इनमें विधवा-विवाह का प्रचलन भी खुलेआम है। मंडला जाति के लोगांे में विधवा विवाह रात्रि में किसी भी दिन सिर्फ रविवार, मंगलवार एवं षनिवार छोड़कर किसी भी दिन किया जा सकता है। तलाक की भी इनमें परंपरा है। लेकिन यह कभी-कभार ही होता है। ऐसे हालात तभी आते हैं जब कोई भी पत्नी, अपने नाजायज संबंध को खुलेआम कर देती है। षुरू-षुरू में पत्नी के आचरण को नजरअंदाज करने की कोषिष की जाती है। यदि इस तरह की नौबत आ जाती है तो गाँव के लोगांे की एक पंचायत बुलायी जाती है, जहाँ पर पति-पत्नी दोनों को उपस्थित होना पड़ता है वही पर गाॅंव का प्रधान उनसे उनकी सहमति पूछता है कि क्या वे दोनों तलाक के लिए पूरी तरह राजी हैं। यदि वे अपनी सहमति जाहिर करते हैं तो उन्हें एक पुआल
तोड़ने के लिए दिया जाता है, जो इस बात को दर्षाता है कि इनक संबंध समाप्त हो गए। इसके बाद पति-पत्नी दोनों को सभा के बीच एक-दूसरे के नाम को जोर से पुकारना पड़ता है। इसके लिए गाँव के प्रधान को 1 से 4 रुपए तक दिए जाते हैं। इसके बाद तलाक की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। किसी-किसी इलाके में पत्नी की चूड़ियों को तालाक के बाद तोड़ने की भी प्रथा प्रचलित है। झाँसी में विधवा को साथ में रखने पर 10 रुपए का जुर्माना एवं किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के साथ रहने पर 60 रुपए का जुर्माना लगाया जाता है।

बच्चे का जन्म
बच्चे का नामकरण या तो उसके जन्म के दिन या जन्म के बारहवें दिन किया जाता है। इस कर्म के लिए औरत बच्चे को खाट पर सुलाती है एवं उसे उबाले गए गेहँू एवं चने को फैलाती है। वहाँ पर उपस्थित लोगों के बीच मिठाई एवं उस गेहूँ को वितरित किया जाता है। बरार में तीसरे दिन जूआरी के आटे का जन्मदिन केक एवं मक्खन दूध अन्य बच्चों के बीच वितरित किया जाता है। पाँचवे दिन डंडे एवं बेलन को साफ किया जाता है तथा उनकी पूजा की जाती है। बारहवें दिन बच्चे का नामकरण किया जाता है और कुछ दिन के बाद बच्चे के सिर के बाल का मुंडन किया जाता है।

दाह-संस्कार एवं श्राद्ध
सामान्य तौर पर मरे हुए व्यक्ति के षरीर को गाड़ने की प्रथा इन जातियों में प्रचलित है। यदि मृत षरीर को जलाया जाता है, तो उसकी अस्थि को तीसरे दिन नदी के टैंक में रखा जाता
है, और यदि तीसरा दिन रविवार या बुधवार को आता है तो उस दिन कर्म नहीं करके पाँचवें दिन किया जाता है। बरार में, जैसा कि मिण् किट्स का कहना हैः धीमर जाति के श्राद्ध का कर्म कांड, गोंड जाति के श्राद्ध कर्म कांड से काफी मेल खाता है। श्राद्ध काल के दौरान मृतक का परिवार अषुद्ध हो जाता है एवं उस परिवार के घर में बना खाना दूसरे लोग नहीं खा सकते। लेकिन दस दिन के बाद जब श्राद्ध खत्म हो जाता है एवं मुख्य श्राद्धकर्ता स्नान कर लेता है, तब एक दिन के बाद समाज को खाना खिलाकर जीवन पूर्ववत् षुरू हो जाता है। श्राद्ध कर्म के कार्यकाल में प्रत्येक दिन एक जलता हुआ दीया लैम्प घर के बाहर रखा जाता है। जब श्राद्ध कर्म पूरी तरह समाप्त हो जाता है तो नए सिरे से जीवन षुरू करने के पूर्व घर के सारे कपड़े एवं घर को पूरी तरह से साफ किया जाता है। इस जाति के लोगों में श्राद्ध कर्म के एक वर्ष पूरे होने पर किसी भी प्रकार के कर्म कांड की प्रथा नहीं प्रचलित है जैसा कि हिंदू के ऊँची जातियों के बीच प्रचलन है। लेकिन अक्षय तृतीया या कृषि वर्ष की षुरूआत के समय घर का मालिक थोड़ा सा भोजन अग्नि को मरे हुए व्यक्ति के सम्मान में देता है।

धर्म
दुल्हादेव धीमर के मुख्य देवता हंै। कदम्ब की लकडी़ मंे इनकी आकृति बनाई जाती है। बरार में अन्नपूर्णा की पूजा की जाती है। अन्नपूर्णा मद्रास की अनाज प्रदान करने वाली देवी हंै, जो दूर्गा या देवी के समान है, जिनकी पीतल के चादर पर घोड़े के साथ आकृति बनाई जाती है एवं पीले तथा लाल हल्दी से लेप किया जाता है। मच्छली मारने के लिए नदी में घुसने से पहले जल-देवता से प्रार्थना की जाती है कि वे उन्हें सही-सलामत रखंे एवं डूबने से बचाएँ। गंगा माई जो गंगा माता हंै, की भी प्रार्थना करने की परंपरा भी इन जाति के लोगों में प्रचलित है। नाव के देवता की भी पूजा करने की परंपरा इनमें प्रचलित है। नाव के देवता को घाटिया देव के नाम से पुकारा जाता है। इनका मंदिर भी होता है। इनके मंदिर वहीं पर बने होते हंै जहाँ पर नाव को बांधकर रखा जाता है। इन जातियों में गाँव के पुजारी की आत्मा को परिहार कहा जाता है, बनयान पेड़ की आत्मा को ब्रह्म देव गोसाई देव पवित्र एवं महान संत को कहा जाता है। देवी को काले बकरे की बलि दी जाने की भी प्रथा इनमें प्रचलित है। बलि के बाद बकरे के हाड़-मांस को एक मिटटी के बर्तन में रखकर घर के अंदर रख दिया जाता है। यदि इस बर्तन में कुछ गिर जाता है तो उसे भी हाड़-मांस के साथ रख दिया जाता है। ऐसा समझा जाता है कि ऐसा ईष्वर की इच्छा से हुआ है, और बच्चे को जिंदा उसमें रख दिया जाता है। लेकिन जब अगले वर्ष उस बर्तन को खोला जाता है तो पाया जाता है कि बच्चा जीवित है तथा खेल रहा है। अतः उनके बीच यह सामान्य अवधारणा है कि देवी उन सभी की रक्षा करती है जो इस बर्तन में बकरे की हाड़-मांस के साथ जिंदा गाड़ दिया जाता है।

रोजगार
धीमर अनेक प्रकार का रोजगार करते हैं। ये मुख्य रूप से मच्छुआरे होते हैं जिनका मुख्य पेषा मछली मारना एवं उसे बेचना होता है। नाव खेना या केवट का काम भी इनका मुख्य धंधा है। ये भिन्न-भिन्न प्रकार के मछली मारने वाले जाल भी बुनते हंै। जाल अलग-अलग उद्देष्य से बुने जाते हैं, ताकि अलग-अलग तरीकों से मच्छली पकडा़ जा सके। कुछ धीमर जाल में पत्थर बांध कर जाल को नदी में मच्छली फँसाने के लिए फेंकते हैं, तो अन्य धीमर लबें बाँस के डंडे को जाल से बांधकर उसे पानी पर पीटते हैं। कुछ धीमर नदी में जाल फेंकने के अन्य तरीके भी अपनाते हैं जैसे जाल को एक छोर से दूसरे छोर तक बांध दिया जाता है, एवं कुछ देर के बाद जाल को नदी से हटा लिया जाता है, एवं इसमें फंसी हुई मछलियों को बाहर निकाल लिया जाता है। धीमर के मछली पकड़ने का एक और तरीका यह है कि यदि नदी पतली है एवं पानी उसमें कम है तो कुछ लोग थोड़ी-थोड़ी दूरी पर जाल को पकड़कर नदी में खडे़ हो जाते हैं एवं जल की सतह पर डंडा को पटकते हैं, एवं बगल में नाव खड़ी रहती है ताकि छोटी मछलियाँ कूदकर नाव में गिर जाएँ। धीमर लोग छोटी-छोटी नावों पर नौकरी भी करते हैं। उनके परंपरागत नावें किसी पेड़ की टहनी को खोखला कर बनाई जाती हैं। वे दिपावली के दिन मछली मारने वाले जाल की अवष्य पूजा करते हैं। वे इस जाल के धागे का इस कदर सम्मान करते हैं कि दिपावली के दिन पूजन करते समय वे उस तरह का कोई भी जूता या चप्पल नहीं पहनते, जो धागे का बना हो। सिंघाडा़ उत्पादन पर इन धीमरों का एकाधिकार होता है। किसी व्रत के दिन उपवास करने पर लोग भोजन की जगह इस सिंघारे को ही आहार बनाते हैं। धीमर लोग सब्जी, खीरा, तरबूज, ककडी़ आदि के उत्पादन में भी लगे हंै। इन चीजों का उत्पादन ये रेत पर करते हैं।
पानी भरना-धीमर लोग हिंदू जाति के लोगांे के घर पर पानी भरने का भी काम करते हैं। यह प्रथा हिन्दुस्तानी जिले में सबसे ज्यादा प्रचलित है जहाँ ज्यादा औरतें घर के अंदर ही रहती हैं, उन्हें बाहर निकलने की ज्यादा छूट नहीं होती है ताकि वे घर से बाहर जाकर अपने घर के लिए पानी भर सकें। जबकि मराठा जिले में जहाँ पर औरतों को घर से बाहर निकलने की इजाजत है, वहाँ पर इन धीमर जाति के लोगों की कोई आवष्यकता नहीं होती है। अतः इन जिलों में धीमर जाति के लोग इस प्रकार के कम ही कार्य करते हैं। इस स्तर पर धीमर सामान्य तौर पर गाँव के मालिक के निजी नौकर के रूप में काम करते हैं। बडे़-बडे़ गँावों में प्रत्येक घर में एक घिनोची होता है, जो मिट्टी या लकड़ी का बना होता है, जिसके ऊपर पानी के चार-पाँच घड़े रखे होते हैं। धीमर का कार्य सुबह-षाम इन घड़ों मंे पानी भरने का होता है, जिसके लिए उन्हें निष्चित 2 या 3 आना माहवारी मिलती हंै। ये सरकारी नौकरों के लिए भी पानी लाते हंै, जब वे छुट्टियों में गाँव आते हैं। उस समय धीमर जाति के लोग उनकी रसोई का कार्य जैसे-गाय के गोबर अथवा मिट्टी से रसोई घर की सफाई करना, पानी भरना, बर्तनों की सफाई करना, भोजन सामाग्री की व्यवस्था तथा बनाने आदि तक का कार्य करते हैं। यदि वे मालगुजार के बर्तनों को साफ करते हैं तो ऐसा करने के लिए उन्हें भोजन दिया जाता है। जब इनके मालिक के घर में षादी होती है तो पूरे षादी कार्यक्रम के दौरान बाराती पार्टी के स्वागत में ये लगे रहते हैं एवं घर तथा बर्तनों की सफाई भी करते हैं। इस कार्य के लिए इन्हें अपनी स्वेच्छा से मालिक द्वारा संतोषजनक पारितोषिक दिया जाता है। धीमर जाति के लोगों का एक अन्य रोजगार यह है कि खेती के समय में ये मीठा आलू या बेर का फल बेचने के लिए ले जाते है। खेत में पानी डालने वाले कृषक के लिए ये खेत में पानी डालने का भी काम करते हैं जिसके लिए इन्हें मजदूरी के रूप में पैसे मिलते हंै। जेष्ठ(मई) माह के पंद्रहवें दिन ये धीमर बडे़ किसान के घर जाते हैं एवं उनके सिर के ऊपर मछली का जाल रखकर उनसे पारितोषिक पाते हैं।
पालकी ढोने वाला एवं निजी नौकर-पुराने समय में जब पहिये वाली गाड़ियों का प्रचलन षुरू नहीं हुआ था, लोग एक जगह से दूसरी जगह पालकी में ही बैठकर आते-जाते थे। इन पालकी के ढोने वाले ये धीमर जाति के लोग ही होते थे, जिन्हें उत्तरी भारत में कहार एवं दक्षिण भारत में धीमर या भोई कहा जाता है। अब एक जगह से दूसरी जगह आने-जाने के लिए इन पालकियों का प्रचलन करीब-करीब पूरी तरह समाप्त हो चुका है, फिर भी ऊँचे घर की अैारतों को कहीं से लाने ले जाने के लिए कभी-कभी इन पालकियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके ढोने की जिम्मेवारी इन्हीं लोगों की होती है। षादी के दौरान भी बहुत सी जगहों पर अभी भी दूल्हा एवं दूल्हन को ले जाने के लिए पालकी का ही प्रचलन है। एक पालकी को ढोने के लिए चार लोगों की आवष्यकता पड़ती है, जिसके लिए उन्हें पहले 1 से 4 रूपए दिए जाते थे। कभी-कभी गाँव के बडे़ लोग प्रदर्षन में भाग लेने पालकी में ही बैठ कर जाते थे। जब धीमर लोग को गाँव का कोई भी व्यक्ति अपने घर स्थायी रूप से काम करने के लिए रखता है तो वह सदैव अपने मालिक के साथ यात्रा पर बाहर जाता है। धीमर जब पानी ढोने का काम करते हैं तो वे पानी अपने सिर या कंधे पर नहीं रखकर बल्कि बहंगी(काँवड़) पर रखते है। बहंगी मे एक बाँस का मोटा डंडा होता है जिसके दोनों छोर पर मोटी-मोटी रस्सियाँ बंधी होती हंै, जिससे पानी का बर्तन बंधा होता है। धीमर अब पालकी ढोने वाले काम ज्यादा निजी नौकर के रूप में कार्य करते नजर आते हंै। धीमर पति-पत्नी किसी ब्राह्मण या ऊँची जाति के लोगों के घर में जब काम करते हंै, तो वे गेहँू के आँटे को पानी के साथ गूथते हैं। वे दाल के लिए पानी गर्म करते हैं, एवं दाल को गर्म पानी में दूर से डालते हैं ताकि बर्तन से उनका हाथ छू न जाए, जब बर्तन में भोजन तैयार करने के लिए अनाज(जिन्स) रखा गया हो।जिनके यहाँ वे काम करते हैं, उस घर के सभी सदस्य के खाने के बाद यदि खाना बर्तन में बच जाता है तो वह खाना इन्हें दे दिया जाता है। चूँकि यह सामान्य अवधारणा है कि जब तक बर्तन में पक्का हुआ भोजन होता है, वह गंदा या अषुद्ध नहीं होता है। भोजन तभी अषुद्ध होता है जब मुँह से लगाने के बाद उस हाथ से उस बर्तन को छू दिया जाता है, जिसमें भोजन होता है। यदि ऐसा होता है तो माना जाता है कि सारा भोजन अषुद्ध(जूठा) हो गया। इस भोजन को अब कोई नहीं खाता है एवं उसे झाडू करने वाली को दे दिया जाता है। केवल पत्नि ही अपने पति के जुठे को खा सकती है। नौकर के रूप में धीमर काफी वफादार होते हैं। इन्हें घर के किसी भी स्थान पर जाने की पूर्ण अनुमति होती है, चाहे वह रसोई घर हो, षयन कक्ष या मालकिन के कमरे। वे अपने मालकिन को माँ भी कहते हंै। मि0 क्रुक का कहना है कि उत्तरी भारत में कहार को कभी-कभी ‘मेहरा’ भी कहा जाता है। यह ‘मेहरा’ षब्द संस्कृत षब्द ‘महिला’ से लिया गाया है जिसका अर्थ होता है, अैारत, मतलब जिसे महिला के घर में जाने की पूर्ण स्वतंत्रता है। ये धीमर इनके घर के जूठे एवं गंदे बर्तन भी साफ करते हैं एवं रसोई घर की सफाई गाय के गोबर से करने की अनुमति होती है। घर में काम करने वाली महिला नौकरानी मुख्यतया धीमर जाति की ही होती है, और सामान्य तौर पर यह भी देखा जाता है कि इनके साथ इनके मालिक नाजायज संबंध स्थापित कर लेते हंै। एक काफी प्रचलित कहावत इसी संदर्भ में इस प्रकार है, ‘राजा का बेटा पानी खींचता है तथा पानी ढोने वाले का लड़का गददी पर बैठता है’। ऐसे गलत संबंध बडे़ घर की औरतों एवं नौकरों के बीच भी बनने के उदाहरण मिलते हैं।

अन्य रोजगार
धीमर जाति के लोग उपर्युक्त रोजगार-धंधों के अलावा और भी अन्य रोजगार के लिए काम करते हैं। जैसे वे भूने हुए अनाज एवं चावल का बेचने का भी काम करते हैं, इसे बेचने के लिए रेलवे स्टेषनों एवं बाजारों में जाते हैं। इन आनाजों को भरभूजा या धूरी कहा जाता है। इन्हें इस प्रकार के कार्य करने की पूर्ण अनुमति होती है, चूँकि तुलनात्मक रूप से इन्हें समाज में ज्यादा षुद्ध जाति के रूप में मान्यता प्रदान की जाती है। अतः इनके हाथ से बने हुए खाने की चीजों को खाने एवं इनके हाथ के पानी को पीने में कोई आपत्ति नहीं है। कुछ धीमर एवं केवट जाति के लोग सन की रस्सी बनाने एवं बोरा बनाने आदि का भी रोजगार करते हैं, लेकिन समाज में इन्हें अन्य धीमरों की अपेक्षा कम सामाजिक महत्व प्राप्त है। ब्राह्मण इनके हाथ के पानी नहीं पीते हैं। कुछ धीमर सूअर पालने का भी कार्य करते हैं। धीमर नारायण देव की बलि में भी भाग लेते हैं। जब सूअर के माँस को अनेक निम्न जाति के लोगों द्वारा खाया जाता है। रेषम के कोषा को पालने का मुख्य व्यापार इन धीमर एवं केवट जाति के लोगों के ही हाथ में है। अपने इस व्यापार के उदे्ष्य से ये लोग दो महीनों तक जगलों में ही अपना घर बना लेते हैं, एवं कोषा-बारिस या सिल्क-बगान पर अपनी नजर टिकाये रहते हंै। इस दौरान ये भोजन दिन में सिर्फ एक बार ही करते हैं। इस समय ये मांस आदि का सेवन बिल्कुल नहीं करते। वे इस समय अपनी दाढ़ी भी नहीं बनाते हैं, और ना ही अपनी पत्नि से मिलते हैं। जब कीड़ों के अंडे को पेड़ांे पर रखा जाता है, तब वे एक सिल्क के धागे को प्रथम पेड़ के चारों तरफ लपेट देते हंै एवं प्रथम पेड़ को पाट देव या सिल्क धागे के देवता के रूप में पूजा करते हैं। दिन में ये हरे कीडां़े के अंडे पर पूरी नजर रखे रखते हंै, ताकि कीट-पतंगें या पक्षी इन्हें अपना षिकार नहीं बना लें। इसके षीघ्र बाद कीड़ों के अंडे को षीघ्र ही एकत्रित कर लिया जाता है, जैसे ही इन्हें लपेट लिया जाता है। इसके बाद लकड़ी की आग में सज्जीखार के घोल में उबाला जाता है, और इससे निकले खाघ-पदार्थ को इनके रखवालों द्वारा खाया जाता है। उबालने से गोंद जैसे इसमे मिश्रित पदार्थ का अंष समाप्त हो जाता है। कीड़ों के अंडे को खाना ठीक उसी प्रकार से उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिस प्रकार षादी-विवाह के समय घड़ियाल का।

सामाजिक स्तर
धीमर जाति के लोगों का सामाजिक स्तर अजीबो गरीब है। खाना बनाने पालकी ढोने तथा घरेलू नौकर के रूप में कार्य करने की वजह से धीमर जाति के लोगों को समाज में उस जाति के समर्थन में रखा गया है, जो साफ-सुथरे होते हंै, और यही वजह है कि उत्तरी भारत में ब्राह्मण भी इनके हाथ का पानी पीते हैं एवं खाना भी खाते हंै। लेकिन यदि हम इनकी उत्त्पति पर नजर डालते हुए इनके सामाजिक स्तर की बात करते हैं। तो कहेंगें कि ये प्राचीन गैर-आर्य जाति के लोग हंै। जैसा कि इनके रीति-रिवाज से भी हमें काफी स्पष्ट होता है। भोजन के रूप में इनका मुख्य भेाजन कच्छुआ, घड़ियाल मेढक,सूअर आदि के मांस है। सूअर के मांस इस जाति के लोग मुख्यतः मराठा जिले में खाते हैं। लेकिन उतरी भारत में जहाँ ये ब्राह्मण के घर में कार्य करते हैं, इन सभी चीजों का सेवन करने को इन्हें नहीं मिलता है। जबलपुर में जैसा पंचम लाल कहते हैं, चार उपजातियों जैसे रेकवार, बाँट, बारमेन तथा पाबेहा, के बीच, एक उपजाति की औरत उस भोजन को नहीं खा सकती जो दूसरे जाति विभाजन के किसी व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो। कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार के भोजन को जो अन्य उपजाति के व्यक्ति द्धारा बनाया गया हो, खा सकता है जबकि औरत से केवल इस प्रकार का जल के साथ नहीं मिलाया जा सकता। कोई औरत अन्य जाति के धातु के बर्तन में रखे जल को ग्रहण कर सकती है लेकिन मिट्टी के बर्तन में रखे जल को नहीं ग्रहण कर सकती है। एक बात और यहाँ ध्यान देने योग्य है कि वह औरत धातु के बर्तन में रखे सिर्फ उसी जल को ग्रहण कर सकती है जो सीधे कुएँ से लाकर रखा गया हो, न कि घिनोची से निकाला हुआ पानी को जो उसमें रखा हुआ हो। लेकिन एक व्यक्ति धीमर जाति के पुरूष या औरत के किसी भी बर्तन का चाहे वह धातु का हो या मिट्टी का पानी पी सकता है। बरार में, जैसा कि किट्स कहते हैं, भोई जाति के लोग लोहार, सुतार (बढ़ई), भाट, धोबी, नाई आदि के घर का न तो भोजन करना पसंद करते हैं, और न ही पानी पीना। ये लोग षादी-विवाह में पालकी ढोने का कार्य भी नहीं करते हंै।
मुहर्रम उत्सव के दौरान वर्ष में एक बार धीमर जाति के लोग मुसलमान जाति के लोगों के हाथ का बना भोजन करते हैं। सिर्फ इस अवसर को छोड़कर इस जाति के लोग कभी भी मुसलमान के घर का खाना नहीं खाते हैं। मुहर्रम के अवसर पर ये जगह-जगह जाकर भोजन की भिक्षा मांगते हैं एवं फकीर को जाकर सांैप देते हैं जो ताजिया के समक्ष थोड़ा सा भेाजन का अंष रख देता है, और षेष भोजन इन धीमर एवं अन्य हिंदू एवं मुसलमानों के बीच बाँट देता है जो वहाँ उपस्थित होते हैं। धीमर, नाई, और बारी, ये तीनों उत्तर भारत के मुख्य घरेलू दास या नौकर होते हंै जिन्हें पौनी-प्रजा कहा जाता है। कभी-कभी अहीर भी इस तरह के कार्य में संलग्न होते हंै। इन घरेलू दासों को षादी विवाह या अन्य दावत के अवसर पर भी आमंत्रित किया जाता है। दावत के दौरान इन लोगों के लिए एक अलग पंक्ति बनी होती है, जहाँ पर एक जाति के लोग एक साथ बैठकर खाना खाते हैं। इनके लिए भोजन एक अलग बर्तन में लाया जाता है। षादी-षुदा औरत या मर्द को किसी भी जाति से बाहर किया जा सकता है, यद्यपि कि वह अपने से निम्न जाति की औरत या मर्द के साथ अपनी षादी बना लिया हो या नियमित रूप से उसके साथ खा-पी रहा हो। लेकिन गैर-षादी षुदा के साथ सिर्फ खाने-पीने के संबंध को अपराध नहीं माना जाएगाा। अस्थायी तौर पर भी समाज से बहिष्कृत करने की परंपरा इन जाति के लोगों के बीच प्रचलित है, यदि वे किसी बिल्ली, कुत्ते, गिलहरी, आदि को जान से मार देते हैं। यदि इस तरह का अपराध कोई करता है तो बाटा जाति द्वारा इनका षुद्धीकरण कराया जाता है। बाटा वह व्यक्ति होता है, जो इनके सारे अपराध को अपने ऊपर ले लेता है। यह बाटा ऐसे अपराधी को नदी के किनारे ले जाकर, उसका थोडा़ सिर का बाल काटता है, एवं एक नारियल तोड़ता है, और उसे नदी में स्नान करवाता है। इसके बाद उसे गाय के गोबर एवं दूध का प्रसाद देता है। इसके बाद वह साथ-साथ खाना खाने के लिए जाता है। बाटा पाँच कौर भरकर खाता है एवं घोषणा करता है कि मैनंे अपराधी का सारा अपराध अपने ऊपर ले लिया है। इस कार्य के लिए पहले बाटा को एक से चार रूपए तक दिए जाते थे। बरार में यदि किसी भोई जाति के व्यक्ति को जाति से बहिष्कृत कर दिया गया हो तो उसे वापस अपनी जाति में षामिल किया जा सकता है यदि वह ब्राह्मण के होठ से लगाए गए जल को पी लेता है एवं षराब से गाँव के लोगांे को भोजन कराता है। ये गाँजा का भी सेवन करते हैं।
जाति की किवंदंत-धीमर जाति के लोग काफी सरल एवं सीधे स्वभाव के होते हैं। जिन्हें लोग आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं। ये पालकी ढोने का कार्य करते हंै तो वे लगातार एक-दूसरे से कुछ बातें करते रहते हैं या जोर जोर से बिना सुर-ताल के स्थानीय गाने गाते हुए मस्ती में चलते रहते हैं ताकि उन्हें ज्यादा थकान न महसूस न हो। इनकी इस विषेषता के बारे में कुछ इस प्रकार एक किवंदंत प्रचलित हैः- ”एक दिन जब महादेव एवं पार्वती दोनों टहल रहे थे, तो पार्वती इसी बीच थक गईं, अतः महादेव ने धूल से चार लोगों को जन्म दिया, जिन्होंने पार्वती को घर पहुँचाया। रास्ते में वे लोग आपस में खूब जोर-जोर से बातें एवं हँसी-मजाक कर रहे थे, जिस वजह से पार्वती को काफी आनंद मिलता था, एवं उनकी थकान काफी कम होती गयी। जब वे उन्हें घर पहुँचाकर लौटने लगे, तो पार्वती ने उन्हें थोड़ी देर रूकने के लिए कहा, एवं अंदर जाकर उनके लिए कुछ इनाम भेजा। इसी बीच एक मारवाड़ी बनिया जो देवी की सभी बातों को सुन चुका था, वह घर के दरवाजे के पास आकर देवी के नौकरों से कहा कि लाओ वह थैला मुझे दे दो, मैं उन्हीं चारों भोई में से एक हूँ, उन्हंे मैं दे दूँगा। थोड़ी देर बाद जब उन भोइयों को देर होने लगी तो वे देवी के दरवाजे के पास गए , इसकी पुकार सुनकर जब देवी बाहर आईं तो सारी कहानी दोनांे को मालूम हुई। भोईयांे ने रोना षुरू किया, एवं देवी से दूसरी बार अपने इनाम के लिए कहा, लेकिन देवी ने इंकार कर दिया और कहा कि तुम लोग बहुत भोले और मूर्ख हो एवं तुम्हारी जाति सदैव गरीब ही रहेगी, लेकिन बहुत खुष एवं आनंदमय भी“।
संदर्भ : द ट्राइब्स एंड कास्ट्स आॅफ नार्थ वेस्टर्न इण्डिया

धुरिया उपजाति के लोग अपनी उत्पत्ति के बारे में निम्न किवदंती का विवरण देते हैं। एक दिन महादेव पार्वती के साथ राजा हिमाचल के घर से लौट रहे थे। उनके सिर पर सामानों का बोझ था। सामानों के बोझ के कारण पार्वती काफी थक चुकी थीं, एवं वे अब आगे चलने में पूरी तरह असमर्थ दिख रही थीं। महादेव ने पार्वती की परेषानी को अच्छी तरह समझते हुए कहा कि देखो पीछे-पीछे जो दो व्यक्ति आ रहे हैं उन्हीं के उपर यह बोझ लाद दिया जाय। इन्हीं दो व्यक्तियों से धूरिया कहार जाति की उत्पत्ति हुई, जिन्हें महादेव ने एक मुट्ठी धूल(धूर) से उत्पन्न किया था। बिहार में कहार स्वयं को मगध के राजा जरासंध के वंषज बताते हैं। यह किवदंती जनरल कनिंघम द्वारा कही गयी है। जब जरासंध मगध का राजा था, तब वह गया षहर के पास गिरियक पहाड़ी पर किला (बैठक) बनवाया था, जहाँ पर वह स्वयं बैठा करता था, एवं अपना पैर नीचे पंचीना के जन में रखता था। इसके बैठने के स्थान के पास ही भगवान (जरासंध का पूर्व नाम) का बगीचा था, जो एक समय के अकाल में सूख चुका था। तदनुसार, भगवान ने इस बाग को दुबारा हरा-भरा करने के लिए अथक प्रयास किया। लेकिन असफल रहा। इसलिए उसने एक दिन इस बात की घोषणा की कि जो भी केवल एक रात में गंगा के जल से इस बाग की पूरी तरह सिंचाई कर देगा, उससे वह अपनी पुत्री से षादी कर एवं आधा राज-पाट प्रदान कर देगा।

स्थानीय लोग पानी फंेकने के साधनों(रस्सी से बंधे टोकरी) के द्वारा धीरे-धीरे पानी को बगीचे में फेंकने लगे और पौधौं की जड़ों तक पानी फेंका जाने लगाा और ऐसाा ही किया गया। जब कार्य पूरी तरह समाप्त होने पर आया तो राजा को अपने द्वारा घोषित उपहारों पर पाष्चात्ताप होने लगा। उसी समय एक बाॅंसुरी वादक राजा की चापलूसी के लिए तथा पुरस्कार की लालच से (च्पचमत) उनकी सहायता करने के लिए उपस्थित हुआ और राजा को प्रोत्साहित करते हुए एक प्रस्ताव दिया कि मैं नर कौआ का रूप धारण कर सकता हँू, और अपनी आवाज से कहारों को सुबह होने से पूर्व ही गुमराह कर सकता हँू। ततपष्चात् राजा ने अपनी कुटिल चाल को सफल होता देख कहारों से कहा कि अपना काम जारी रखो। इसी बीच नर कौआ काॅंव-काॅंव करने लगा। कौए की आवाज सुनकर कहारों ने सोचा कि सुबह हो गई और हमारा काम समय पर पूरा नहीं हो पाया। काम पूरा न होने के भय से कहारों ने सोचा कि भगवान उपहारों के एवज् में कहीं हमें दंड निर्धारित न कर दे। इसलिए भयभीत होकर काम छोड़ कर नदी के किनारे मोकामा नामक जगह पर भाग गए। सुबह हाने पर राजा ने उन कहारों को खबर भिजवाई कि वे आकर अपनी मजदूरी ले जाएं। लेकिन भय के कारण कोई भी कहार मजदूरी लेने नहीं आया। जब कोई नहीं आया तो राजा ने कुछ को समझाकर मजदूरी लेने के लिए राजी किया एवं प्रत्येक कहारों को मजदूरी के रूप में साढे़ तीन सेर अनाज दिया। उसी समय से यह परंपरा बन गई कि कहारों को उनके काम के बदले मजदूरी के रूप में प्रत्येक दिन साढे़ तीन सेर अनाज प्रदान किया जायेगा।

अन्य प्रचलित किवदंती
अन्य प्रचलित यह है कि कहार जाति के लोग ब्राह्मण को अपने आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं। जैसा कि बरेली में इस प्रकार का भी उदाहरण हमें देखने को मिलता है कि एक दिन मुनि नारद ‘गुरु’ की खोज में भगवान राम के पास गये। भगवान राम ने कहा कि कल सुबह तुम्हारी ‘गुरु’ से मुलाकात हो जायेगी। सुबह जिस व्यक्ति से तुम्हारी प्रथम मुलाकात होगी वही तुम्हारा गुरू होगा। अतः मुनि नारद ने भगवान राम के कथनानुसार जो व्यक्ति सुबह सबसे पहले मिला, उसे झुककर उन्होंने प्रणाम किया एवं ‘गुरु’ कहकर उसे सम्बोधित किया। लेकिन षीघ्र ही नारद मुनि ने देखा कि जिस व्यक्ति को मैंने ‘गुरु’ माना है, वह व्यक्ति तो धीमर कहार जाति का मछुआरा है। उसके कंधे पर मछली मारने वाला जाल था। इससे प्रतीत हुआ कि वह मछली मारने का रोजगार करने वाला व्यक्ति है। नित्यप्रति की तरह वह मछली मारने जा रहा था। नारद मुनि ने विचार किया और सोचा कि इसको मैं अपना ‘गुरु’ कैसे मान सकता हूँ और कहा कि मैं तुम्हें अपना गुरु नहीं मान सकता। नारद के इस बात पर कहार क्रोधित होकर षाप दिया कि तुम्हें स्वर्ग में जाने के लिए 84 लाख योनि (जीव) से गुजरना पडे़गा। यानि कि 84 लाख जीव-जंतुअेंा एवं सभी प्रजातियों में तुम्हें जन्म लेना पडे़गा। तब तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी। उस कहार के षाप पर मुनि काफी परेषान एवं चिंतित हो गए और भगवान राम से असंतोष प्रकट किया। लेकिन उन्होंने उनकी प्रार्थना पर ध्यान नहीं दिया। इसलिए नारद मुनि विवस होकर जमीन पर 84 लाख जीव-जन्तुओं, कीडे़-मकोडे़ का चित्र बनाकर उनका श्रद्धापूर्वक एक बार चक्कर लगाया। इसके उपरांत उस कहार से हाथ जोड़कर प्रार्थना एवं याचना की कि वे उन्हें माफ कर दें। मुझसे अनजाने में बहुत बडी़ भूल हो गई थी। अब मैं आप को ‘गुरु’ स्वीकार करता हूँ एवं ‘गुरु’ कहकर सम्बोधित किया। उसी समय से धीमर कहार जाति के लोग स्वयं को ब्राह्मणों का ‘गुरु’ मानते हैं। ब्राह्मण को अपना गुरु नहीं स्वीकार करते। बल्कि ‘जोगी’ को अपना गुरु मानते हैं।

विवाह नियम
कोई भी व्यक्ति अपनी उपजाति के परिवार के भीतर ही षादी करेगा। लेकिन एक ही गोत्र में नहीं। इसके अतिरिक्त झाँसी में एक परंपरा यह है कि कोई भी व्यक्ति अपने चाचा की बेटी की षादी पिता या माता की तरफ नहीं कर सकता है या पिता या माता के बहन के यहाँ भी नहीं कर सकता। ज्यादातर जगहों में एक साधारण व्यवस्था इस बारे में प्रचलित है कि कोई भी व्यक्ति ऐसे परिवार में षादी नहीें करेगा, जहाँ पर संबंध बरकरार हों। यदि काफी जाँच पड़ताल एवं सावधानी के साथ इस तरह के संबंधों का न होना पता चलता है, तो षादी की जा सकती है। बहु-विवाह इनमें प्रचलित है। लेकिन कुछ बंधन भी इस प्रकार आरोपित किए गये हैं। झाँसी में इस बात का प्रचलन है कि यदि कोई व्यक्ति पहली पत्नी के रहते हुए दूसरी षादी करना चाहता है, तो उसके लिए उसे अपने पहली पत्नी की अनुमति लेनी होगी। यदि पहली पत्नी इसके लिए अनुमति नहीं प्रदान करती है, तो वह व्यक्ति इस प्रकार की अनुमति लेने के लिए पंचायत की षरण ले सकता है। परिषद(सभा) इस बात की पूरी तरह तहकीकात करती है कि उस व्यक्ति द्वारा आखिर किस आधार पर इस बात के लिए अनुमति माँगी जा रही है। उस व्यक्ति के मांग के आधार ठोस हैं या नहीं, कहीं वह औरत बाँझ या रोगी तो नहीं है। यदि इन बातों की पुषिट हो जाती है, तो परिषद(सभा) उस व्यक्ति को दूसरी षादी करने की इजाजत दे सकता है। यदि व्यक्ति के माँग के आधार ठोस नहीं साबित होते हैं तो उस व्यक्ति को दूसरी षादी की इजाजत नहीं मिल सकती। एक नियम के अनुसार यदि कोई लड़की अनाथ, या गरीब हो तो उसकी षादी की उम्र आठ साल तय की गई है, एवं लड़के की षादी पंद्रह साल से पहले होनी जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियाँ हैं तो सबसे बड़ी पत्नी को जेठी(श्रमजीप) के नाम से उसकी छोटी पत्नियाँ संबोधित करेंगी, तथा अपने जेठी की आज्ञा को मानने के लिए बाध्य होंगी। यदि किसी लड़की की पहले कभी षादी नहीं हुई है, तो कोई भी व्यक्ति उसे अपने पास रख नहीं सकता। यदि वह व्यक्ति किसी विधवा या किसी की औरत को अपने पास रखना चाहता है, तो इसके लिए उसे अपनी जाति के लोगों को भोजन कराना होगा एवं उसे विधवा के मरे हुए पति के परिवारजनों को क्षतिपूर्ति भी देनी होगी। झाँसी में अवैध रूप से किसी विधवा को रखने के लिए दस रुपये का एवं दूसरे की पत्नी को रखने के लिए साठ रुपये के जुर्मानें का प्रावधान है। कुँवारी के लिए कोई भी कीमत नहीं देनी पड़ती है। यदि किसी व्यक्ति की औरत चोरी करती है या अपनी संपत्ति का नुकसान करती है या किसी के साथ अवैध संबंध स्थापित करती है, तो वह व्यक्ति उस औरत से अपना संबंध विच्छेद कर सकता है। यदि इस तरीके से औरत को तलाक कर दिया जाता है, तो ऐसा औरत तथा उसके पति को स्टैंप पेपर पर एक तलाकनामा बनाकर ही किया जा सकता है और बच्चों को पुरखों की संपत्ति पर बराबर का हक प्राप्त करने की मान्यता प्रदान की गई है।

विधवा विवाह
इस जाति के लोगों में विधवा विवाह को मान्यता प्रदान की गई है। ऐसा करने से पहले परिषद (सभा) को सूचित किया जाता है, एवं अपने जाति के लोगों को भोजन कराना पड़ता है। यदि मरे हुए व्यक्ति का भाई जवान एवं अविवाहित(अर्थात देवर) हो तो उसकी षादी उस विधवा औरत के साथ हो सकती है।

विवाह प्रथा
विवाह प्रथा सामान्य प्रकार का ही इन जाति के लोगों में भी है। गरीब लोग डोला (पाँव-पूज) रूप में षादी करते हैं। इस प्रकार की षादी में सभी प्रकार के उत्सव दूल्हा के ही घर पर किए जाते हैं। नियमित षादी (ठलंी ब्ींतीनलं) में एक बाध्यकारी प्रथा इन जाति के लोगों में यह प्रचलित है कि लड़की (दूल्हन) के पिता द्वारा दूल्हा के पैर की पूजा की जाती है जिसे पैर-पूजा या पाँव पूजा कहा जाता है।

धर्म
जब किसी जवान या षादीषुदा व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तब उसका दाह-संस्कार किया जाता है। यदि वह षादीषुदा नहीं है, तो उसे जमीन के अंदर दफना दिया जाता है। उसके सम्मान में साधारण तरीके से श्राद्ध-कर्म किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति किसी गाय, गदहा या बिल्ली की हत्या कर देता है, तो उस व्यक्ति को अपराधी घोषित कर दिया जाता है। उसके बाद अपराधी को गंगा नदी में स्नान कराया जाता है और वहाँ से लौटने के बाद उसे ब्राह्मणों (और अपनी बिरादरी) को भोजन कराना पड़ता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से उसके सारे पाप धुल जाते हैं। कहार लोग काफी पुराने ख्यालों के हिन्दू हैं एवं अनेक साधारण देवताओं की भी वे पूजा करते हैं। प्रांत के पूर्व क्षेत्र में वे भैरो, महावीर, बिरतिया, पाचांेपीर, अमीना सती को अमीना भवानी के रूप में श्रद्धा से पूजा की जाती है। महावीर को पूजा में वस्त्र, फूल की माला एवं जनेऊ अर्पित किए जाते हैं। भैरो को बकरे की बलि तथा साथ में षराब भी चढा़ई जाती है। अमीना को जवान सुअर एवं साथ-साथ षराब की भी भेंट चढा़यी जाती है। पाचोंपीर की पूजा आमतौर पर जेष्ठ के महीने में की जाती है। पाचोंपीर की खीरा, षरबत एवं केक आदि से पूजा की जाती है। इसके अतिरिक्त सीतला, हरदौस, लाला एवं भूमिया स्थानीय देवता हैं। कहा जाता है कि इस जिले में देवी की पूजा हिंदू एवं मुस्लिम दोनों रीति के साथ की जाती है। एक मुसलमान एक खटिक धीमर के साथ श्रीन देवी के मंदिर तक जाते हैं। जब किसी जानवर की बलि दी जाती है, तो मुसलमान इस समय कालिमा पढ़ते हैं। झाँसी में जब सिंघाड़े की खेती की ष्ुारूआत करते हैं, तो वे एक स्थानीय देवता, सिलोमन बाबा, की पूजा करते हैं एवं साथ-साथ उनके भाई माधो बाबा की भी पूजा की जाती है, तथा उन्हें बकरे और षराब की भेंट भी चढ़ायी जाती है। यदि वे तरबूज की खेती करते हैं, तो एक स्थानीय देवता घटौरिया बाबा की पूजा करते हैं। जब धीमर लोग पालकी उठाते हैं या मछली मारने के लिए जाते हंै, तो वे कालू कहार का स्मरण करते हैं।
झाँसी में यदि कोई व्यक्ति मर जाता है, तो उसके मरने के तीसरे दिन दाढ़ी एवं बाल मुँडवा दिए जाते हैं, एवं इसके बाद स्नान किया जाता है, जिसे ‘पुन का बुलान’ कहा जाता है। मरे हुए व्यक्ति के पुतले बनाए जाते हैं, जो पुआल एवं लकड़ी से बनाए जाते हैं। जो इसमें भाग लेते हैं, वे पाँच या सात बार विषेष रुप से इस उदेष्य के लिए तैयार किए गए भोजन को मुँह से लगाते हैं। इसके बाद पुतले एवं दान को सड़क के किनारे छोड़ दिया जाता हैं। फिर आगंतुक दाह-संस्कार कर्म का भोजन करते हैं।

सामाजिक रीति-रिवाज
लड़के के लिए सात एवं लड़की के लिए पांच नाम प्रस्तावित किए जाते हैं। लेकिन पहला नाम सिर्फ रोज पुकारने एवं किसी प्रकार के उत्सव में प्रयोग किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति का बच्चा बार-बार जन्म लेकर मर जा रहा है तो फिर उस बच्चे का नामकरण किसी भद्दे नाम से किया जाता है। जैसे डमरू, बसोरा आदि, ताकि बच्चा जीवित रह सके। जबकि, किसी व्यक्ति को परिषद के सामने कसम खाना होता है, तो एक बर्तन में गंगा जल एवं तुलसी का पत्ता उसमें रख दिया जाता है। यदि गंगा जल उपलब्ध नही है तो उसकी जगह किसी कुएँ के पानी का इस्तेमाल करते हैं, वह पानी सिर्फ अविवाहित लड़की ही कुएँ से खींच सकती है। झाँसी में महराता षासन काल के अतंर्गत इन जाति के लोगों में अग्नि परीक्षा की प्रथा थी। खासतौर से इसमें गर्म सरिया से दागना प्रचलित था। चूँकि यह षासन पूरी तरह से ब्रिटिष सरकार के अधीन था इसलिए ब्रिटिष सरकार ने इस प्रथा पर पाबंदी लगा दी थी। वे लोग थोड़ी-बहुत षगुन (ऊपरी हवा) में विष्वास करते थे। किसी व्यक्ति के बीमार होने की स्थिति में वे बुरी आत्मा को दूर करने के लिए ‘सयाना या जादुई षक्ति’का सहारा लेते थे। आखातीज मेला जो वैषाख के महीने में लगता है। उस समय झाँसी के धीमर लोग पचकिनया के नजदीक देवी जी के मंदिर के पास एकत्रित होते हैं। मेले में औरत-मर्द सभी आते हैं, एवं षादी-षुदा औरत एवं मर्द यहाँ पर एक-दूसरे का नाम लेकर पुकारते हैं, जो कि प्रतिबंधित होता है। जब माघ के महीने में तरबूज की खेती की षुरूआत की जाती है, तो कोई एक खास षुभ दिन को इस महीने में चुनाव कर बड़ा गणेष के सम्मान में एक भोज का आयोजन किया जाता है। वे आखातीज उत्सव पर आने वाले कृषि (फसल) समय के लिए षगुन करते हैं। एक बर्तन में चने के चार अनाज रखते हैं, एवं पाँच घड़े को पानी से भरते हैं, एवं इनमें से चार घड़े में इन चने के चारों अनाजों को नचाते हैं। इसका अर्थ हुआ कि चारों घड़ा बरसात के चारों महीनों-आषाढ़, सावन, भादो और क्वार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

व्यवसाय एवं सामाजिक स्तर
कहार जाति के लोग विभिन्न प्रकार के व्यवसाय किया करते हंै। देष के पष्चिमी इलाके के कहारों का, जैसा की मि. इब्बटसन लिखते हैं, मुख्य व्यवसाय पालकी या डोली ढोना, मछली मारना एवं जल संबंधित कार्य करना है, जबकि पंजाब के पूर्वी इलाके के कहार टोकरी बनाने का भी कार्य करते हैं। ये लोग पालकी ढोने एवं कंधे पर सामान आदि ढोने का कार्य मुख्य रूप से करते हंै। इन जाति के लोग मुख्य रूप से जल कार्यों से संबंधित हुआ करते हैं। गाँव के कुएँ से पानी निकालने का कार्य कहार जाति के लोग ही करते हैं। गाँव के तालाब में सिंघाड़ा का उत्पादन करना भी इनके मुख्य धंधों में से एक है। ये लोग जाल से बनमुर्गी फँसाने का कार्य करते हंै। अपनी क्षमता के अनुसार ये लोग टोकरी निर्माण करते है एंव काष्तकार को बेचते हंै, और खेत पर काम करने वाले किसानों के लिए इस टेाकरी में पानी ले जाते हैं। गाँव के बडे़ लोगांे के यहाँ विवाह या अन्य उत्सवों के अवसर पर ये लोग वहाँ जाकर घर का कार्य करते हैं एवं अतिथियों को पानी पिलाते हंै। जैसा कि हम जानते हैं कि ये लोग घरेलू नौकर के रूप मंे भी कार्य करते हंै, तो इन्हंे इस बात की पूरी छूट होती है कि ये गृहपति के घर के किसी स्थान या कमरे, यहाँ तक कि गृहपत्नि के षयन कक्ष में भी जा सकते हंै। इसके अतिरिक्त, जिस घर की औरतें घर से बाहर नहीं निकलती हैं, उनके लिए भी ये घर में पानी पहुँचाने का कार्य करते हंै। इसी प्रकार अन्य अवसरों पर भी कहार जाति के लोग टोकरी में पानी पहँुचाने का कार्य करते हैं। जहाँ तक इनके सामाजिक स्तर की बात है, तो यह कहा जा सकता है कि इनका सामाजिक स्तर एक संबंध में ऊँचा है। चूँकि सभी जाति के लोग, (सिर्फ कन्नौजिया बाह्मण के लोगों को छोड़कर) इनके हाथ का पानी पीते है, एवं पक्का खाना (पूड़ी-सब्जी) भी खाते हैं। जो लोग निजी सेवा का कार्य अपने मालिक के घर करते हंै, वे स्वयं को अन्य व्यवसाय करने वाले लोगांे, जैसे-पत्थर तराषनेे, मछली मारने एवं बोझा ढोने वाले से उच्च स्तर के मानते हैं, खास तौर से जब लड़की की षादी की बात की जाती है। इस प्रकार के कार्य करने वाले कहार स्वयं को अन्य उन लोगों से उत्तम मानते हैं, जो नौकर का कार्य करते हैं। एक संवाददाता के अनुसार ‘‘कहार इस हद तक छोटी जाति के हैं कि इस के जाति लोग धोबी एवं चमार जाति के लोगों को छोड़कर सभी जाति के लोगों का बर्तन साफ करने का कार्य करते हैं। लेकिन ठीक इसी समय यह इतनी उत्तम जाति है कि सिर्फ कन्नौजिया-बाह्मण को छोड़कर सभी जाति के लोग इनके हाथ का छुआ हुआ पानी पीते हंै, एवं पक्का खाना खाते हैं।’’ ये लोग षराब पीते हैं तथा सूअर का मांस भी खाते हैं। कुछ लोग जैसा कि मि. रिस्ले कहते हैं कि खेत के चूहे भी पकड़ कर ये लोग खाते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद इनकी अपनी कुछ मर्यादाएँ भी हैं। इसलिए यदि कोई कहार, राजपूत, बाह्मण, कायस्त, बामन या अग्रवाल जाति के यहाँ निजी सेवा के रूप मे कार्य करता है और यदि वह षादी-षुदा नही है तो वह अपने मालिक द्वारा खाकर छोड़े हुए भोजन को ग्रहण कर सकता है। हमें यह भी जानकारी मिलती है कि इस जाति की औरतें नाक में नथुनी (छवेम.त्पदह) नहीं पहन सकती हैं एवं ललाट पर गोदना भी नहीं गोदवा सकती हैं। झाँसी में खाने का नियम है कि नाई एवं कच्छी के साथ बैठकर पक्का खाना(पूड़ी-सब्जी) खा सकते हैं। लेकिन नाई के द्वारा बनाया हुआ भोजन ये लोग नहीं खाते हैं। सबसे नीच जाति के लोग जिसके साथ ये लोग कच्चा खाना(दाल,चावल,रोटी एवं सब्जी इत्यादि) खाते हैं, वे लोग अहीर जाति के लोग हैं, एवं भंगी जाति को छोड़कर सभी जाति के लोगांे के साथ धूम्रपान करते हैं। पूर्व में कहार जाति के लोगों द्वारा बनाए गए पक्का भोजन को बनिया खाते हैं, तथा चमार एवं अन्य नौकर कच्चा भोजन खाते हैं। स्वयं वे कच्चा खाना खाते हैं, जो राजपूत एवं बाह्मणों द्वारा तैयार किये होते हैं। ये लोग दीपावली के आठ दिन पूर्व ‘होई’ पर्व मनाते है। इसके लिए गाय के गोबर से घर की लिपाई-पुताई की जाती है और घर की दीवारों पर छोटी सी रंगीन डोली एवं डोली को ढोने वाले कहारों की तस्वीर भी बनाई जाती है। इनमें एक परंपरा यह भी प्रचलित है कि कलियुग की षुरूआत होने से जब असमय मृत्यु, अकाल और दुराचरण आदि का प्रकोप बढ़ जाता है, एवं जमीनें सारी बर्बाद होने लगती हंै, तो ब्राह्मण लोग इससे बचने के लिए उपवास रखते हैं, तथा महीने के प्रत्येक सातवें दिन (आधी रात के अंधेरे में ) प्रार्थना करते हैं। यदि इससे भी रक्षा का कोई हल नहीं निकलता है, तो झिवारनी इनके बीचधुरिया उपजाति के लोग अपनी उत्पत्ति के बारे में निम्न किवदंती का विवरण देते हैं। एक दिन महादेव पार्वती के साथ राजा हिमाचल के घर से लौट रहे थे। उनके सिर पर सामानों का बोझ था। सामानों के बोझ के कारण पार्वती काफी थक चुकी थीं, एवं वे अब आगे चलने में पूरी तरह असमर्थ दिख रही थीं। महादेव ने पार्वती की परेषानी को अच्छी तरह समझते हुए कहा कि देखो पीछे-पीछे जो दो व्यक्ति आ रहे हैं उन्हीं के उपर यह बोझ लाद दिया जाय। इन्हीं दो व्यक्तियों से धूरिया कहार जाति की उत्पत्ति हुई, जिन्हें महादेव ने एक मुट्ठी धूल(धूर) से उत्पन्न किया था। बिहार में कहार स्वयं को मगध के राजा जरासंध के वंषज बताते हैं। यह किवदंती जनरल कनिंघम द्वारा कही गयी है। जब जरासंध मगध का राजा था, तब वह गया षहर के पास गिरियक पहाड़ी पर किला (बैठक) बनवाया था, जहाँ पर वह स्वयं बैठा करता था, एवं अपना पैर नीचे पंचीना के जन में रखता था। इसके बैठने के स्थान के पास ही भगवान (जरासंध का पूर्व नाम) का बगीचा था, जो एक समय के अकाल में सूख चुका था। तदनुसार, भगवान ने इस बाग को दुबारा हरा-भरा करने के लिए अथक प्रयास किया। लेकिन असफल रहा। इसलिए उसने एक दिन इस बात की घोषणा की कि जो भी केवल एक रात में गंगा के जल से इस बाग की पूरी तरह सिंचाई कर देगा, उससे वह अपनी पुत्री से षादी कर एवं आधा राज-पाट प्रदान कर देगा।
स्थानीय लोग पानी फंेकने के साधनों(रस्सी से बंधे टोकरी) के द्वारा धीरे-धीरे पानी को बगीचे में फेंकने लगे और पौधौं की जड़ों तक पानी फेंका जाने लगाा और ऐसाा ही किया गया। जब कार्य पूरी तरह समाप्त होने पर आया तो राजा को अपने द्वारा घोषित उपहारों पर पाष्चात्ताप होने लगा। उसी समय एक बाॅंसुरी वादक राजा की चापलूसी के लिए तथा पुरस्कार की लालच से (च्पचमत) उनकी सहायता करने के लिए उपस्थित हुआ और राजा को प्रोत्साहित करते हुए एक प्रस्ताव दिया कि मैं नर कौआ का रूप धारण कर सकता हँू, और अपनी आवाज से कहारों को सुबह होने से पूर्व ही गुमराह कर सकता हँू। ततपष्चात् राजा ने अपनी कुटिल चाल को सफल होता देख कहारों से कहा कि अपना काम जारी रखो। इसी बीच नर कौआ काॅंव-काॅंव करने लगा। कौए की आवाज सुनकर कहारों ने सोचा कि सुबह हो गई और हमारा काम समय पर पूरा नहीं हो पाया। काम पूरा न होने के भय से कहारों ने सोचा कि भगवान उपहारों के एवज् में कहीं हमें दंड निर्धारित न कर दे। इसलिए भयभीत होकर काम छोड़ कर नदी के किनारे मोकामा नामक जगह पर भाग गए। सुबह हाने पर राजा ने उन कहारों को खबर भिजवाई कि वे आकर अपनी मजदूरी ले जाएं। लेकिन भय के कारण कोई भी कहार मजदूरी लेने नहीं आया। जब कोई नहीं आया तो राजा ने कुछ को समझाकर मजदूरी लेने के लिए राजी किया एवं प्रत्येक कहारों को मजदूरी के रूप में साढे़ तीन सेर अनाज दिया। उसी समय से यह परंपरा बन गई कि कहारों को उनके काम के बदले मजदूरी के रूप में प्रत्येक दिन साढे़ तीन सेर अनाज प्रदान किया जायेगा।

आंतरिक संगठन
कुछ छोटी-छोटी उपजातियों को छोड़कर कहार जाति के लोग मुख्यरुप से 15 उपजातियों में विभाजित हैंः-(1) बाथम; (2) बोट; (3) धीवर या धीमर;(4) धुरिया; (5) गोड़िया; (6) घरुक; (7) जैसवार; (8) कमकर; (9) खरवार; (10) महार;(11) मल्लाह; (12) रैकवार; (13) रवानी; (14) सिंघाड़िया; और(15) तुरेहा या तुरुई। इन उपजातियों में बाथम जाति के लोगों ने अपना नाम श्रावस्ती षहर से अपनाया है। बोट एक प्रसिद्ध पहाड़ी क्षेत्र के जनजाति हैं। धुरिया या धीमरों की उत्पत्ति की कहानी विस्तृत रूप से ऊपर कही जा चुकी है। घरूक या ‘घरवाले’ (घर) मुख्य रूप से सोने वाले होते हैं। गोड़िया किसी न किसी प्रकार जैसा कि वे स्वयं वर्णन करते हैं कि ये गोड़ (ळवदत) वंष से संबंधित हैं। जैसवार ने अपना नाम ‘जैस’ षहर से अपनाया है। महार के विषय में पहले ही वर्णन किया जा चुका है। मल्लाह नाव खेने वाली जाति के रूप में प्रसिद्ध हैं। रैकवार स्वयं को राजपूत के करीबी समझते हैं।

मिर्जापुर में इन्हें सात नामों से जाना जाता है-(1) तुराहा; (2)बाथम; (3) धुरिया; (4) धीमर; (5) रवानी या रमानी; (6)खरवार या खरवारा और (7)जैसवार।
बिजनौर में ये स्वयं को धनैार कहते हैं। इनकी पांच उपजातियाँ हैं। जैसे-(1) नराई; (2) पछाड़े या पष्चिमी; (3) गोले; (4) खागी अैार (5) धनौर। इनमें गोले जाति के कहार नदी के किनारे मछली पकड़ने के चक्कर में घूमते रहते हैं तथा सिरकी की झोंपडी़ में रहा करते हैं।
झाँसी में ये अलग-अलग नाम से विभाजित हैं। जैसे-रैकवार, बाथम, धुरिया, गुड़िया, नोरिया, मल्लाह एवं तुरैहा या तुरूई। जिनके अनेक गोत्र हैं। जैसे-इमिलिया, एतेरिया, मुंडेरिया, डहरिया एवं दमरौनिया।
ललितपुर से हमें जो सूची इन लोगों के उपजाति के बारे में प्राप्त होती है। वे इस प्रकार हंै- गोड़िया, धुरिया, मालवी और गोटिया।
बरेली में पुनः इनकी दस उपजातियों का उल्लेख मिलता है। जैसे-(1) तुरूई या तुरैहा; (2) बाथम; (3) गोड़िया या गुड़िया; (4) धुरिया; (5) थनेसरा; (6) महावर; (7) बोट; (8) किरा; (9)खरवार और (10) चंदर। आंतिम दो उपजातियाँ, जाति से बाहर हैं।
आगरा में तुरूई लोगों का कहना है कि वे मच्छंदर या मत्सीयेन्द्रनाथ के वंषज हैं और तुलसी उनकी माँ थी। वे नाव खेने और पालकी ढोने का काम करते थे। वे किसी बोझ को बाँस की बहंगी पर ढोते हैं जो कंधें के सहारे ले जाया जाता है। वे कीड़े-मकाडे़ को नहीं मानते हैं और ठीक यही प्रचलन हम रैकवार, धुरिया एवं खरवार लोगों के बीच भी पाते हैं। सिंघारिया जाति के लोगों का मुख्य पेषा सिंघाड़े का उत्पादन करना है। चंदेल एवं बेस सुअर का मांस खाते हैं। पूर्वी जिले मेें गोड़(ळवदक) हैं। जैसे-(1) नराई; (2) पछाड़े या पष्चिमी; (3) गोले; (4) खागी अैार (5) धनौर। इनमें गोले जाति के कहार नदी के किनारे मछली पकड़ने के चक्कर में घूमते रहते हैं तथा सिरकी की झोंपडी़ में रहा करते हैं।
झाँसी में ये अलग-अलग नाम से विभाजित हैं। जैसे-रैकवार, बाथम, धुरिया, गुड़िया, नोरिया, मल्लाह एवं तुरैहा या तुरूई। जिनके अनेक गोत्र हैं। जैसे-इमिलिया, एतेरिया, मुंडेरिया, डहरिया एवं दमरौनिया।
ललितपुर से हमें जो सूची इन लोगों के उपजाति के बारे में प्राप्त होती है। वे इस प्रकार हंै- गोड़िया, धुरिया, मालवी और गोटिया।
बरेली में पुनः इनकी दस उपजातियों का उल्लेख मिलता है। जैसे-(1) तुरूई या तुरैहा; (2) बाथम; (3) गोड़िया या गुड़िया; (4) धुरिया; (5) थनेसरा; (6) महावर; (7) बोट; (8) किरा; (9)खरवार और (10) चंदर। आंतिम दो उपजातियाँ, जाति से बाहर हैं।
आगरा में तुरूई लोगों का कहना है कि वे मच्छंदर या मत्सीयेन्द्रनाथ के वंषज हैं और तुलसी उनकी माँ थी। वे नाव खेने और पालकी ढोने का काम करते थे। वे किसी बोझ को बाँस की बहंगी पर ढोते हैं जो कंधें के सहारे ले जाया जाता है। वे कीड़े-मकाडे़ को नहीं मानते हैं और ठीक यही प्रचलन हम रैकवार, धुरिया एवं खरवार लोगों के बीच भी पाते हैं। सिंघारिया जाति के लोगों का मुख्य पेषा सिंघाड़े का उत्पादन करना है। चंदेल एवं बेस सुअर का मांस खाते हैं। पूर्वी जिले मेें गोड़(ळवदतद्ध पत्थर काटने, पानी खींचने एवं पालकी ढोने का काम करते हैं। पालकी ढोने का काम वे मूषहर एवं खेतिहर के साथ मिलकर करते हैं। इनका एक मुख्य पेषा ‘तालाब’ से सिंघाडे़ को इकटठा करना तथा उसे बेचना है। धीमर जो कि पष्चिमी जिले एवं पंजाब के झिनवार जैसे होते हैं, उनका मुख्य कार्य मछली मारना एवं नाव खेना है। इनके साथ एक अन्य उपजाति ‘चाई’ का भी उल्लेख मिलता है, जिसका मुख्य कार्य मछली मारना होता है। मि. अटीकेषन के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में इनकी बारह उपजातियों का उल्लेख मिलता है। इनमें से रवानी, घानिक, गोड़िया, खरवार एवं नवार कूड़ा-कर्कट एवं पुआल आदि ढोने का काम करते हैं, और ये चैकीदार का भी काम करते हैं। बाथम भी इसी प्रकार के कार्य में संलग्न होते हैं। लेकिन ये लोग भड़भूजे का भी कार्य करते हैं। मल्लाह नाव खेने का काम करता है। तुराहा एवं बोट मुख्य रूप से हरी सब्जियाँ बेचने का कार्य करते हैं, तथा खेती बाडी़ के कार्य में भी संलग्न रहते हैं। बारी का मुख्य कार्य टोकरी एवं दोनें एवं पत्तलें बनाना है।

जनगणना
जनगणना में हिन्दू के 823 एवं मुसलमान के 24 वर्गों का उल्लेख मिलता है। इनमें से स्थानीय रूप से लोकप्रिय जातियाँ हैं-देहरादून के जालियाँ और सहारनपुर के देसवाली धौंचक एवं गुरवाल, बुलन्दषहर के बल्लई, चैहान, गहलोट, मक्खनपुरिया, नोइबन, रोनिडा, सरमोधना और तोमर, अलीगढ़ के भीरगुडी एवं रावत, मथुरा के देसवली, आगरा के काध एवं मथुरिया, फरूखाबाद के भारसिवा, मैनपुरी के खागी, मथुरिया, मटियावार एवं पछाड़े, बरेली के बोडाले एवं खागी, मुरादाबाद के खागी एवं पछाड़े, षाहजहाँपुर के सनौरिया, कानपुर के निषाद, झाँसी के जुरिया एवं खरे, ललितपुर के कच्छवाहा, बलिया एवं बनारस के कन्नौजिया, जौनपुर के पवार एवं सक्ता, गाजीपुर के हरदिहा, गोरखपुर के जेठवंत, बस्ती के दस्खिनहा एवं सोराहिया, आजमगढ़ के कन्नौजिया एवं गोंड, लखनऊ के भोंद एवं निषाद, उन्नाव के भोंद, खैर पुरिया, बरेली के भोंद, दिना घतवारिया, जेठवंत, निषाद एवं रौतिया, सीतापुर के जेठवंत, हरदोई के गुरूनाथ एवं जेठवंत, बहराइच के जेठवंत, खरमोरहा, लुनिया, मेधा, निषाद एवं तुर्किया, सुल्तानपुर के निषाद, पसकौटा, प्रतापगढ़ के पसकौटा या पासी केवट, बाराबंकी के भोंद, खरमौना, मोरहा, नाथ, निषाद। उपर्युक्त उल्लेखित विभिन्न प्रकार की जातियों से आज के वर्तमान में जो जातियाँ अस्तित्व में आई हैं, उनकी जटिलताओं के बारे में हमें कुछ आधारभूत जानकारी प्राप्त हो सकती है।

जनजातीय परिषद
झाँसी जिले की धीमरों के परिषद के आधार पर हम इन जनजातियों के परिषद के संगठन के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इनका परिषद पंचायत के नाम से जाना जाता है। सभी जाति के लोग इस परिषद में षामिल होते हैं एवं इन्हीं में से ये पंच का चुनाव प्रथम सभा में किया जाता है। ये सभा के प्रवक्ता होते हैं। पंच ही सभी मुकदमों की सुनवाई करते हैं और निर्णय को सभा में सुनाते है। अंतिम निर्णय करने का हक पंच को ही सभा द्वारा दिया जाता है। पंचायत द्वारा निर्धारित निम्न प्रकार के कार्य हैं-
1. यदि विधवा विवाह होता है तो उस औरत का होने वाला दूसरा पति, उसके पहले पति के परिवार को पंचायत द्वारा किए गए फैसले के आधार पर क्षतिपूर्ति करना पड़ता है।
2. यदि कोई व्यक्ति किसी प्रकार का अपराध, जैसे मालिक के घर में चोरी, किसी औरत के साथ बुरा बर्ताव या जोर-जबर्दस्ती आदि करता है तो पंचायत उसे समाज से बहिषकृत कर सकती है।
3. संपत्ति के विवादों का निपटारा भी पंचायत ही करता है।झाँसी में बारह मुखिया, बारह मुहल्ला (पूरा मुहल्ला) के लिए होते हैं। कोरम बनाने के लिए कम से कम किसी एक मुख्य व्यक्ति का वर्तमान होना आवष्यक होता है। जब निर्णय देना समाप्त हो जाता है तो दोनों वादी-प्रतिवादी पंचायत के निर्णय को मानने के लिए बाध्य होते हैं। यदि किसी प्रकार से इस निर्णय का उल्लंघन किया जाता है, तो इसके लिए दंड का प्रावधान है। उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को समाज से निकाला या जुर्माना हो सकता है।
संदर्भ : द ट्राइब्स एंड कास्ट्स आॅफ नार्थ वेस्टर्न इण्डिया

The present paper reports the ethnographic profile of Yerukala, a plains tribe living in West Godavari district of Andhra Pradesh. This paper is based on the data collected through various ethnographic techniques in some villages of Narasapuram mandal. The social status of the tribe is very low in rural areas. However, they claim superior status over scheduled castes. It is a patriarchal society. And it possessed a few sub-tribes and several exogamous patrilineages. Uncle-niece marriages and cross cousin marriages are highly preferred. Child marriages are not unusual. And monogamy is common. It is a patriarchal society and patrilocal residence is the norm. People are no vegetarians. Most of the Yerukula people are illiterate. Occupationally, these people have the history of being involved in criminal activities such as burgling and dacoit. However, many of the Yerukulas have changed their occupation. Religion of the Yerukula is animistic and the influence of Hinduism and Christianity is noticed.
Most of the tribal populations live in hilly agency areas, which are clearly demarcated from the plain rural and urban areas, geographically. However, there are some tribes, which live in plain areas. Though there are studies on Andhra tribes, studies on plain tribes are limited. On Yerukula tribe, little ethnographic description is available (Parthasarathy 1988; Radhakrishna 2000; Simhadri 1991; Viswanadha Reddy 2003). These studies are based on Yerukula people living areas other than Godavari region. Hence, the present study was aimed to present the ethnographic profile of Yerukala, a plain tribe living in West Godavari district of Andhra Pradesh.

THE PEOPLE:-
The Yerukulas derive their name from Eruku knowledge or acquaintance. The origin of the tribe tells how ‘renuka’, who came to life with male head, and came to be known as ‘Ellamma’, the patron deity of the tribe. The Yerukala tribe inhabits the south coastal districts of Andhra Pradesh. Yerukula, a vagrant gypsy tribe, is bearing an evil reputation as professional criminals, and now settled as pork sellers, basket makers in Andhra Pradesh. The Yerukula migrated all over the state but basically they are from Prakasam and Krishna districts of coastal Andhra Pradesh. In the Godavari districts, these tribes rear the pigs and sell the pork. Some people depend on basket making and daily laboring while the women wander from village to village as fortune tellers and as tattooists. They speak a mongrel dialect, which appears to be a mixture of Tamil, Telugu and Konkani. Their huts are generally funnel shaped and are made of date mats, twigs, palm leaves and coconut leaves. The men are scantily clothed, wearing a piece of cloth above the loin (gochi) and an old turban on the head. The women wear saris and have brass bangles on both arms.

The Bhoi derive their community name from Bhai(brother).This affectionate mode of address was made by the Rana of Mewar as one of the community members saved the Rana from hunger and thirst once when he lost his inmates in the jungle in a hunting expedition.In course of the time the term Bhai is corrupted to Bhoi.The community has eleven endogamous sub castes which are Raj Bhoi, Kahar Bhoi, Sakarvansi Bhoi, Kashi Mata Bhoi, Dhimwar Bhoi, Machhi Bhoi, Kir Bhoi, Ir Bhoi, Mata Bhoi(Shiv Mata Bhoi), Singaria Bhoi, Kunjdo Bhoi. Mythological they relate their origin from the wishes of Lord Shiva who made two idols-one men and a women. They were given life and married .From the union eleven sons were born representing eleven subcastes of the Bhoi.They are distributed in Udaipur, Jaipur and Chittorgargh districts. They speaks Bagri among themselves. Men can speak Hindi also and use Devnagari script.
The Bhoi are non-vegetarian.Beef is prohibited. Their staple food is maize and wheat. Some times they take rice also. They take pulses like chana(gram), urad, tur, moon, masur, etc.Groundnut oil and mustard oil are their cooking media. They consume seasonal fruits. Milk is taken occasionally. Rice beer and mohua liquor are alcoholic drinks, the Bhoi men consume occasionally. During festivals and ceremonies they prepare some special items. Owing to the influence of the Bhagat movement ,the Bhoi are giving up non-veg foods and alcohol. Among the Bhoi subcastes inter dining is permitted excepting with kunjdo Bhoi. Distinct hierarchy is discernible among the groups depending on the pollution purity concept and nature of the economic pursuits.Raj Bhoi claim the highest position and place the Kunjdo Bhoi at the lowest rung. There are many exogamous clans among them. The clans are equal in social status and has its own deity.Some of the clans are Dahima, Abala, Kekdia, Saktawat, Chandna, etc .In the local social hierarchy the bhoi place themeslf in the middle order below Rajput, Brahman, Bania and above Harijans and tribals.

The Bhoi are an endogamous community. They maintain subcaste endogamy. The marriage age is maintained at eighteen to twenty years for girls and twenty to twenty-five years for boys. Negotiation is the prime mode of selecting a mate. Exchange of brides is preferred to avoid bride-price. The prevalent form of marriage is monogamy. A man may go for second wife in case of having no issue from first wife. Vermilion mark in hair parting is the main symbol of marriage observed by the Bhoi women. Dapa(bride-price)is a precondition of marriage among the Bhoi. Gharjamai system (marriage by service)is practiced in certain cases where bride price is not paid. Rule of residence after marriage is partilocal. Dissolution of marriage occurs in case of maladjustment and adultery offender is punished. Remarriage (nat a) of divorced woman and widowed and widower are permitted. Divorcee woman or widow can not marry a bachelor. But a divorced man or widower may marry a virgin.

Both horizontal and vertical extended families exist among them. The younger brothers joke with elders wives. The movable and immovable properties are inherited in equal shares among the sons. But in case of gharjamai the property is given in the name of the daughter. The eldest son becomes the head of the family. The inter-family linkage is strong. The Bhoi work in the agriculture field, sell the vegetables in the market. Besides, they perform all household jobs. They are kept away of social and political affairs. In the sphere of religious and ritual affairs, women's role is immense.
They have a status lower than that of their men. The Bhoi strictly observe pre-delivery rituals as well as restrictions. The first delivery is mostly done at pear(parent's house).During the seventh of pregnancy the pregnant woman's parent come to fetch her. The mother-in-law perform gosh bharna(lap filling)ceremony. The delivery is done by dai(midwife),They observe sutak(birth pollution)for one and half month. The naming ceremony is performed on tenth day. marriage season starts after Diwali and continues for four months. The saga(engagement) is fixed at an early age. Ten days before the marriage married women (elder brother's wife and such kins) relatives smear the turmeric paste on the bride and groom. The marriage is solemnized by the local Brahman priest at bride's place. The bride and the groom takes seven rounds phera of the sacrificial fire. Then follows kanyadan. The following day the bride is brought to groom's place. Consummation of marriage takes place at groom's house. Immediately after the death of a person all the relatives are informed. The corpse is washed and wrapped in new piece of cloth and carried to the cremation ground. The eldest son puts fire followed by the other relatives. On the third day unburnt bones and ashes are preserved and taken to Beneswar during annual fair for disposal. They observe twelve days asouch(pollution).They maintain thirty seven days restriction on non-vegetarian food. The dead children below two years of age are buried.

The Bhoi are mainly a land owning -community barring a few who subsist on day labour and some have shifted from traditional occupation to tailoring, business and services. Traditionally they were water-carriers, palanquin bearers and vegetable-growers.They sell their products directly in the market. The ayets(Jajman)like Brahman, Nai dai(mid wife) and Kumhars(potters) are paid in grains and vegetables.
The Bhoi have their own caste council(sati panch)at village level, tehsil level as well as at district level. The election is held every three years through secret ballot. This panch settle all types of disputes in the community, organize the members of the community, and rectify the social norms. The statutory panchayat looks after the development programs extended by the government.
The bhoi profess Hindu religion and worship Hindu Gods and goddesses. Every day they worship their family deity Lord Ganesha(Gajanam) with agarbatti (scented camphor stick).Each clan has separately deity. During magi purnima a big fair is held at Beneswer the confluence and of Mahi-Som river. They go there for shradh ceremony. Besides, they visit Puskar fair at Ajmer.They celebrate Diwali, Holi, Rakhshabandhan, Navratri. They have decorative arts on the walls and floors. Bhoi , have folk songs and folk tales.

The Bhoi have socio-economic and political linkage with Bania, Balai, Brahman, Chamar, Bhil, Patel etc.. Water sources, crematorium, school, religious shrines are shared with other communities. They participate in politics in the local and regional levels.

The literacy level in general among Bhoi is low. The parents attitude towards boys's education is favorable while they like their daughters to work at home in the favorable while they like their daughters to work at home in the kitchen and field. The family planning programme is well accepted by them. They use fuelwood, cow dung cake and kerosene oil for cooking purpose.

By -S.K.Mandal
Reference: Enthoven,R.E.,1920,The Tribes and Castes of Bombay,Bombay:Government central Press,reprint 1975,Delhi:Cosmo Publications,Vol,I.p.181,182,195.

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